Papankusha Ekadashi 2026: पापांकुशा एकादशी है समस्त पापों से मुक्ति और परम पद की प्राप्ति का अवसर, कथा के साथ पढ़ें पूरी जानकारी
punjabkesari.in Wednesday, Oct 21, 2026 - 05:06 PM (IST)
Papankusha Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस (एकादशी) का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्त्व है। इस पावन तिथि को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी मनुष्य के जीवन में किए गए घोर से घोर पापों पर अंकुश लगाकर उनका नाश कर देती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक इस दिन निष्ठापूर्वक भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें जीवन के अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

अश्वमेघ और सूर्य यज्ञ के समान मिलता है पुण्य फल
शास्त्रों और पुराणों में वर्णित है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से साधक को हजार अश्वमेघ यज्ञ तथा सौ सूर्य यज्ञ का अनुष्ठान करने के बराबर महान पुण्य फल प्राप्त होता है। जो श्रद्धालु इस तिथि पर दिनभर व्रत रखकर रात्रि में जागरण करते हैं, वे पीताम्बरधारी होकर गरुड़ ध्वज से युक्त भगवान विष्णु के परम धाम को प्रस्थान करते हैं। केवल इतना ही नहीं, इस एकादशी के प्रभाव से साधक अपनी मातृपक्ष की 10, पितृपक्ष की 10 तथा पत्नी के पक्ष की भी 10 पीढ़ियों का उद्धार करने में समर्थ हो जाता है।

पापांकुशा एकादशी पूजा विधि
घर की उत्तर-पूर्व दिशा में सफ़ेद कपड़े पर शेष शैया पर सोए विष्णु का वो चित्र रखें, जिसमें से उनकी नाभि से कमल उदय हो रहा हो। पीतल का कलश स्थापित करें। कलश में जल, दूध, सुपारी तिल व सिक्के डालें, कलश के मुख पर पीपल के पत्ते रखकर उस पर नारियल रखें तथा विधिवत पूजन करें। तिल के तेल का दीप करें, चंदन की अगरबत्ती जलाएं, चंदन चढ़ाएं, नीले फूल चढ़ाएं व 11 केलों का भोग लगाएं तथा तुलसी की माला से 108 बार यह विशेष मंत्र जपें।
पापांकुशा एकादशी पूजा मंत्र: ॐ पद्मगर्भाय नमः॥
पापांकुशा एकादशी दान
वैसे तो किसी भी वस्तु का दान करना व्रत में अति उत्तम कर्म है परंतु इस दिन ब्राह्मणों को सुन्दर वस्त्र, सोना, तिल, भूमि, अन्न, जल, जूते, छाता, गाय और भूमि आदि का दान करने का महात्मय है। शास्त्रानुसार किसी भी वस्तु का दान करते समय यथासम्भव दक्षिणा देना भी अति आवश्यक है और मन में कभी भी देने का गर्व भी मन में नहीं करना चाहिए।

पापांकुशा एकादशी पौराणिक व्रत कथा: जब एक क्रूर बहेलिए का हुआ उद्धार
पौराणिक कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वत पर 'क्रोधन' नामक एक अत्यंत क्रूर बहेलिया रहता था। उसका पूरा जीवन हिंसा, लूटपाट और गलत कार्यों में ही व्यतीत हुआ था। जब उसका अंतिम समय निकट आया, तो यमराज ने अपने दूतों को उसे यमलोक लाने की आज्ञा दी। यमदूतों ने समय से पूर्व ही उसे सूचित कर दिया कि उसकी मृत्यु निकट है।
मृत्यु और यमलोक की भयंकर यातनाओं के भय से कांपता हुआ बहेलिया तुरंत ऋषि अंगिरा के आश्रम में पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर यातनाओं से बचने का उपाय पूछने लगा।
दयालु ऋषि अंगिरा ने उसे आश्विन शुक्ल पक्ष की 'पापांकुशा एकादशी' का पूरे विधि-विधान से व्रत और श्री हरि विष्णु का पूजन करने का परामर्श दिया। बहेलिए ने ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए श्रद्धापूर्वक यह व्रत किया। एकादशी के प्रभाव से उसके जीवन के समस्त पाप नष्ट हो गए और मृत्यु के पश्चात वह यमलोक जाने के बजाय सीधे विष्णु लोक को प्राप्त हुआ।

