Premanand Maharaj: गणतंत्र दिवस पर फौजियों को देखकर भावुक हुए प्रेमानंद महाराज, सैनिकों को बताया ‘सच्चे प्रेम और तपस्या’ का प्रतीक
punjabkesari.in Monday, Jan 26, 2026 - 03:41 PM (IST)
Swami Premanand Ji Maharaj Pravachan: देश आज 77वां गणतंत्र दिवस पूरे उत्साह और गौरव के साथ मना रहा है। इस बीच वृंदावन से जुड़ा एक भावुक कर देने वाला दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज राष्ट्र के वीर जवानों को देखकर भाव-विभोर होते नजर आए। गणतंत्र दिवस के पावन अवसर पर जब कुछ फौजी भाई उनके दर्शन के लिए पहुंचे, तो प्रेमानंद महाराज ने न केवल उनका आत्मीय स्वागत किया, बल्कि राष्ट्र रक्षा में उनके योगदान को लेकर ऐसी बातें कहीं, जिसने हर किसी का दिल छू लिया।
गणतंत्र दिवस पर भावुक हुआ संत का हृदय
26 जनवरी के अवसर पर प्रेमानंद महाराज के आश्रम में पहुंचे सैनिकों को देखकर वातावरण अत्यंत भावनात्मक हो गया। महाराज ने सैनिकों को देखकर गहरी संवेदना और सम्मान व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह दिन केवल परेड, झंडारोहण या उत्सव का नहीं, बल्कि उन वीरों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का है, जो हर पल राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगाए रहते हैं।
“सैनिक की सेवा नौकरी नहीं, महा-तपस्या है”
प्रेमानंद महाराज ने अपने संबोधन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि सैनिक का कार्य किसी भी सामान्य नौकरी से कहीं ऊपर है।
उन्होंने कहा, “जहां सैनिक को खड़ा कर दिया जाता है, वहीं वह अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार रहता है। यह सेवा नहीं, बल्कि महा-तपस्या है।”
उन्होंने यह भी कहा कि देशवासी जो सुरक्षित वातावरण में रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं, वह केवल सीमाओं पर खड़े उन जवानों की वजह से संभव हो पाता है, जो भीषण ठंड, गर्मी और कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहते हैं।
समाज से की विनम्र अपील
प्रेमानंद महाराज ने समाज की सोच पर भी गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सैनिकों को केवल सरकारी कर्मचारी या नौकर समझना सबसे बड़ी भूल है।
उनका कहना था कि जो व्यक्ति अपने परिवार, सुख-सुविधाओं और निजी जीवन को त्यागकर राष्ट्र के लिए जीता है, वह सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी है। सैनिकों का सम्मान करना हर नागरिक का परम धर्म है।
संत और सैनिक: एक ही सिक्के के दो पहलू
अपने विचारों में गहराई जोड़ते हुए प्रेमानंद महाराज ने संत और सैनिक की सुंदर तुलना की। उन्होंने कहा कि संत अपनी साधना और तपस्या से राष्ट्र को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं, जबकि सैनिक अपने बलिदान से देश की भौतिक और भौगोलिक सीमाओं की रक्षा करते हैं। दोनों ही राष्ट्र के कल्याण के लिए अपने-अपने मार्ग से समर्पित हैं।
प्रेम और स्वार्थ के बीच का अंतर समझाया
सैनिकों के उदाहरण के माध्यम से प्रेमानंद महाराज ने प्रेम की वास्तविक परिभाषा भी समझाई। उन्होंने कहा कि आज के समय में जिसे प्रेम कहा जाता है, वह अक्सर स्वार्थ पर आधारित होता है।
उनके अनुसार, “सच्चा प्रेम वह है जिसमें कुछ पाने की अपेक्षा न हो। सैनिक राष्ट्र के लिए बिना किसी स्वार्थ के खड़ा रहता है, यही वास्तविक प्रेम है।”
