Holi 2026: नव सस्येष्टि वैदिक यज्ञ से जुड़ा है होली का पर्व, जानें इसका धार्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व
punjabkesari.in Wednesday, Mar 04, 2026 - 09:08 AM (IST)
Holi 2026: पर्व उत्सव हमारी सनातन वैदिक संस्कृति के आधार स्तम्भ हैं। इन उत्सवों में हमारे ऋषि-मुनियों का गहन और सूक्ष्म तत्वदर्शन समावेशित है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला होली का उत्सव नव सस्येष्टि वैदिक यज्ञ के नाम से जाना जाता है (नव + सस्य + इष्टि : एक प्राचीन वैदिक कृषि उत्सव जिसका अर्थ है ‘नई फसल का यज्ञ)।

वसंत ऋतु में रबी की फसल के रूप में गेहूं, चना आदि जो अन्न हमारे घर में आता है, उसको हवन में आहुति देकर ग्रहण करना अर्थात वसंत ऋतु में आई रबी की नवजात फसल, जिसे होलक (होला) कहा जाता है, को अग्नि में समर्पित करने के बाद ही उपयोग का विधान है।
भारत कृषि प्रधान देश है। प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी रूप में कृषि से अवश्य जुड़ा हुआ है। कृषक के लिए यह नई फसल के आगमन पर उल्लास की अनुभूति का पर्व है। महत्वपूर्ण फसलों के आगमन पर उत्सवों का आयोजन हमारी संस्कृति की मुख्य विशेषता है। वेदों में अमावस्या और पूर्णिमा के अवसर पर वृहद यज्ञों के अनुष्ठान का विधान किया गया है।
नई फसल के पके हुए भाग को अग्निहोत्र में समर्पित करके कृषक ईश्वरीय शक्ति के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। हमारी संस्कृति में घर में आए खाद्य पदार्थों को सर्वप्रथम अग्निहोत्र के माध्यम से ईश्वर को समर्पित करने का विधान है।
अथर्ववेद में कहा गया है कि- ‘जो मनुष्य स्वयं अकेला खाता है, वह मानो पाप का भागी होता है।’ इसलिए नवान्न को सर्वप्रथम यज्ञ के माध्यम से प्रकृति के देवों में अर्पित करके तत्पश्चात मिल-बांटकर खाने का विधान निश्चित किया गया है।

वसंत ऋतु में आने वाला होली का यह उत्सव शरद ऋतु और ग्रीष्म ऋतु का संधि काल माना गया है। इस मौसम में पर्यावरण में सूक्ष्म जीवाणु, विषाणु तथा कीटाणुओं का समावेश हो जाता है इसलिए इस पर्व पर ऋतु परिवर्तन के साथ यज्ञों का अनुष्ठान हमारे ऋषियों की वैज्ञानिकता एवं आध्यात्मिकता की सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है।
यह पर्व प्रकृति एवं आयुर्वेद के अनुकूल है। वसंत ऋतु में आयुर्वेद के अनुसार वात-पित्त-कफ दोषों को सम रखने के लिए होलक को भून कर खाने का वर्णन प्राप्त होता है। पुराणों में वर्णित होलिका-प्रहलाद की कथा भी सूक्ष्म संदेश से समावेशित है।
होलिका आसुरी शक्तियों की प्रतीक है और प्रहलाद हृदय से समर्पित ईश्वरीय भक्त का प्रतीक है। यह कथा इस पर्व पर हमें यह संदेश देती है कि विकट से विकट परिस्थितियों तथा आसुरी और पैशाची शक्तियों के साथ द्वंद्व में विजय सदैव ईश्वर के प्रति आस्थावान भक्त की होती है। प्रतिपल ईश्वरीय शक्ति के प्रति समर्पण और आस्था का भाव रखना इस कथा का मर्म है।

वसंत ऋतु के इस परम सौंदर्य में प्रकृति दुल्हन की तरह सजी हुई होती है। प्रकृति में चारों ओर उल्लास, नव ऊर्जा तथा मादकता का संचार हो जाता है इसलिए होली के अवसर पर प्रकृति से बने रंगों के माध्यम से इस उल्लास में मगन होना मनुष्य को आंतरिक प्रसन्नता से परिपूर्ण करता है। रंग हमारे जीवन में पूरी तरह से घुले-मिले हुए हैं।
धार्मिक क्रियाओं में भी रंगों का विशेष महत्व है। हमारे ऋषियों ने रंगों के विज्ञान को समझ कर ही धार्मिक कार्यों में रंगों का समावेश किया था। कुमकुम, हल्दी, अबीर, गुलाल, मेहंदी जैसे रंग प्रत्येक धार्मिक कार्य में प्रयोग होते हैं।
सूर्य की सात रश्मियों में सात रंग समावेशित हैं। इस पर्व पर एक-दूसरे पर इन्हीं सात्विक रंगों के माध्यम से गुलाल लगाकर हर्ष प्रकट करने का अवसर है इसलिए यह दिवस हमारे ऋषियों द्वारा प्रदत्त रंगों के मानो विज्ञान को प्रदर्शित करता है।
समाज में साथ-साथ रहते हुए मन में मलिनता का होना संभव है जिसे दूर करने के लिए वर्ष में एक बार क्षमा, याचना तथा प्रेम, निवेदन करना होली पर्व का मुख्य संदेश है।

इस पर्व पर पुराने मतभेदों, वैमनस्य, शत्रुता आदि को भुलाकर नए मैत्रीपूर्ण संबंधों को स्थापित करने का नूतन प्रयास किया जाता है। होली ऐसा जनोत्सव है जिसमें अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति-पाति, स्त्री-पुरुष, इन सभी भेदभाव को भुलाकर आनंद में मगन होने का संदेश निहित है।
मन को तनाव, ईर्ष्या, द्वेष की ग्रन्थि से मुक्त करने का तथा जीवन को आनंदमय बनाने का पथ इसी उत्सव से प्रदर्शित होता है। यह वैदिक पर्व सामाजिक समरसता, आनंद, उल्लास से परिपूर्ण समाज का निर्माण करने की स्वस्थ परंपरा का संदेश देता है। होली पुराने विचारों और पुरानी जीवनशैली के विघटन और जीवन में स्नेह, सौहार्द, प्रेम तथा करुणा को धारण करने का अवसर प्रदान करती है।

