Premanand Ji Maharaj Teachings : सावधान ! मंदिर में की गई ये 1 छोटी सी गलती छीन सकती है आपका सारा पुण्य, जानें प्रेमानंद जी की नसीहत
punjabkesari.in Saturday, Jan 24, 2026 - 02:47 PM (IST)
Premanand Ji Maharaj Teachings : प्रसिद्ध संत प्रेमानंद जी महाराज अपने सत्संगों के माध्यम से अक्सर भक्तों का मार्गदर्शन करते हैं। उनके विचार न केवल आध्यात्मिक होते हैं, बल्कि व्यावहारिक जीवन में सुधार लाने वाले भी होते हैं। हाल ही में उन्होंने मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बातें बताई हैं, जिन्हें हम अनजाने में नजरअंदाज कर देते हैं। अक्सर हम मंदिर भगवान का आशीर्वाद लेने जाते हैं, लेकिन अनजाने में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिन्हें प्रेमानंद जी ने अपराध या पाप की श्रेणी में रखा है। तो आइए जानते हैं मंदिर जाते समय किन बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है।

मंदिर में सांसारिक गपशप से बचें
प्रेमानंद जी कहते हैं कि मंदिर भगवान का घर है, गपशप का मैदान नहीं। लोग अक्सर मंदिर के प्रांगण में बैठकर राजनीति, व्यापार या घर-परिवार की बुराई करने लगते हैं। महाराज जी के अनुसार, मंदिर में बैठकर किसी की निंदा करना या व्यर्थ की बातें करना पुण्य की जगह पाप का भागी बनाता है। वहाँ केवल मौन रहें या नाम जप करें।
भगवान की पीठ की ओर न खड़े हों
अक्सर दर्शन की होड़ में हम यह भूल जाते हैं कि हम कहां खड़े हैं। प्रेमानंद जी बताते हैं कि मंदिर में कभी भी भगवान की मूर्ति की ओर पीठ करके नहीं खड़ा होना चाहिए। यह अनादर का प्रतीक है। साथ ही, गर्भगृह के ठीक सामने खड़े होकर दर्शन करने के बजाय थोड़ा किनारे होकर खड़े होना चाहिए ताकि दूसरों के दर्शन में बाधा न आए।

मंदिर की संपत्ति और स्वच्छता का ध्यान
महाराज जी अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि मंदिर की मर्यादा उसकी पवित्रता में है। मंदिर में गंदगी फैलाना, दीवारों पर कुछ लिखना या वहां की वस्तुओं का दुरुपयोग करना भारी दोष माना जाता है। इसे भगवान की सेवा में बाधक माना जाता है।
मोबाइल का मोह त्यागें
आज के दौर में लोग भगवान को देखने से ज्यादा कैमरे में कैद करने में व्यस्त रहते हैं। प्रेमानंद जी के अनुसार, जब आप मंदिर में हों, तो आपका पूरा ध्यान साक्षात ईश्वर के चरणों में होना चाहिए। फोन चलाना, रील बनाना या फोटो खींचना आपकी एकाग्रता को भंग करता है और इसे भक्ति में 'विक्षेप' माना जाता है।
दर्शन के बाद अहंकार का त्याग
कई लोग मंदिर से बाहर आकर इस बात का घमंड करते हैं कि उन्होंने कितना दान दिया या वे कितनी देर लाइन में लगे। प्रेमानंद जी नसीहत देते हैं कि भक्ति में मैं का कोई स्थान नहीं है। मंदिर से निकलते समय यह भाव होना चाहिए कि "हे प्रभु, आपकी कृपा से दर्शन हुए, अब मुझे सन्मार्ग पर ले चलें।"

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