Pitru Paksha 2026: जानें कब से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध, तिथियों की पूरी सूची और 3 अक्टूबर का विशेष संयोग
punjabkesari.in Saturday, Aug 22, 2026 - 07:50 AM (IST)
Pitru Paksha kab se hai 2026: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति सम्मान, श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक बेहद पावन और महत्वपूर्ण समय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए श्रद्धापूर्वक तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। माना जाता है कि विधि-विधान से किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं।
25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के साथ गणेश विसर्जन यानि गणेश उत्सव के समापन के बाद 26 सितंबर से इस साल के पितृ पक्ष का आरंभ होगा। इस दौरान नाराज़ पितरों को भी मनाया जा सकता है और जीवन में आने वाली सारी बाधाओं का सफाया किया जा सकता है। हर साल की तरह, इस वर्ष भी पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होगी और इसका समापन आश्विन अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। आइए विस्तार से जानते हैं कि वर्ष 2026 में पितृपक्ष कब से कब तक रहेगा और इसकी सभी महत्वपूर्ण तिथियां क्या हैं।

कब से कब तक रहेगा पितृ पक्ष 2026?
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा के दिन से होने जा रही है। वहीं, इसका समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को आश्विन अमावस्या के दिन होगा, जिसे सर्वपितृ अमावस्या भी कहा जाता है।

3 अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी श्राद्ध का विशेष संयोग, जानें क्यों?
इस साल पंचांग के अनुसार एक विशेष स्थिति बन रही है। 3 अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी दोनों तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। इसके पीछे का मुख्य कारण यह है कि सप्तमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह 7:59 बजे तक ही रहेगी। इसके तुरंत बाद अष्टमी तिथि आरंभ हो जाएगी, जो अगले दिन 4 अक्टूबर को सुबह 5:51 बजे समाप्त होगी। इसी वजह से 3 अक्टूबर को सप्तमी और अष्टमी दोनों का श्राद्ध मनाया जाएगा, और इसके अगले दिन यानी 4 अक्टूबर को नवमी का श्राद्ध किया जाएगा।

Shradh Dates 2026 List पितृ पक्ष 2026 श्राद्ध की संपूर्ण तिथियां
पितृ पक्ष के दौरान प्रत्येक तिथि का अपना एक विशेष महत्व होता है। आमतौर पर जिस तिथि को हमारे परिजनों का निधन हुआ होता है, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध और तर्पण करने का विधान है। साल 2026 की सभी तिथियां निम्नलिखित हैं:

26 सितंबर, शनिवार – पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर, रविवार – प्रतिपदा श्राद्ध
28 सितंबर, सोमवार – द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर, मंगलवार – तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर, बुधवार – चतुर्थी श्राद्ध
1 अक्टूबर, गुरुवार – पंचमी श्राद्ध
2 अक्टूबर, शुक्रवार – षष्ठी श्राद्ध
3 अक्टूबर, शनिवार – सप्तमी और अष्टमी श्राद्ध (विशेष संयोग)
4 अक्टूबर, रविवार – नवमी श्राद्ध
5 अक्टूबर, सोमवार – दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर, मंगलवार – एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर, बुधवार – द्वादशी श्राद्ध
8 अक्टूबर, गुरुवार – त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर, शुक्रवार – चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर, शनिवार – सर्वपितृ अमावस्या (पितृ पक्ष का अंतिम दिन)

श्राद्ध कर्म के नियम और जरूरी बातें
शास्त्रों में श्राद्ध का भोजन करने के विषय में कुछ खास व आवश्यक नियम बताए गए हैं। जो व्यक्ति श्राद्ध के दौरान इनका पालन करते हैं तो उनकी लाइफ में आने वाले कष्टों से उसका बचाव खुद उनके पूर्वज करते हैं। श्राद्ध का भोजन किसी दूसरे के घर का नहीं ग्रहण करना चाहिए, लेकिन अपने कुल गोत्र के परिवार जन में भोजन करने पर कोई दोष नहीं लगता।
कहा जाता है साधक को श्राद्ध का भोजन नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे स्वाध्याय की बढ़ोत्तरी होती है। स्वाध्याय, अर्थात अपने कर्मों का चिंतन करना। कहा जाता है अगर हम ऐसे संस्कारों के साथ श्राद्धस्थल भोजन करने जाएंगे, तो वहां के रज-तमात्मक वातावरण का अधिकतर प्रभाव हमारे शरीर पर होता है। जिससे हमें अधिक कष्ट हो सकता है। वहीं यदि कोई इंसान साधना करता है, तो श्राद्ध का भोजन करने से उसके शरीर में सत्त्वगुण की मात्रा घट सकती है। इसलिए, आध्यात्मिक दृष्टी से श्राद्ध का भोजन करना लाभदायक नहीं माना जाता।
ऐसा माना जाता है श्राद्ध का रज-तमात्मक युक्त भोजन ग्रहण करने से उसकी सूक्ष्म-वायु हमारी देह में घूमती रहती है। ऐसी अवस्था में जब हम पुनः भोजन करते हैं, तब उसमें यह सूक्ष्म-वायु मिल जाती है। इससे, इस भोजन से हानि हो सकती है।
यही कारण है कि हिंदू धर्म में बताया गया है कि उपरोक्त कृत्य टालकर ही श्राद्ध का भोजन करना चाहिए। अन्यथा कलह से मनोमयकोष में रज-तम की मात्रा बढ़ जाती है। नींद तमप्रधान होती है। जिससे हमारी थकान तो अवश्य मिट जाती है, पर शरीर में तमोगुण भी बढ़ जाता है। इसलिए कोशिश करें कि श्राद्ध पक्ष से तेरवीं आदि तक मृतकों के निमित्त बनाएं गए भोजन को ग्रहण न करें।

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