मुनि तरुण सागर का प्रहार: क्या आप भी खुद को दे रहे हैं जीते-जी मुखाग्नि ? जानें, सुखी जीवन के 4 अचूक और कड़वे सूत्र
punjabkesari.in Wednesday, Aug 12, 2026 - 10:14 AM (IST)
Muni Tarun Sagar Kadve Pravachan: क्रांतिकारी संत मुनि तरुण सागर जी महाराज अपने बेबाक और 'कड़वे प्रवचनों' के माध्यम से समाज को आईना दिखाने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके शब्द जितने तीखे होते हैं, जीवन के लिए उतने ही सत्य और कल्याणकारी भी। वर्तमान दौर में जहां युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में है और परिवारों में क्रोध के कारण बिखराव हो रहा है, मुनि श्री के ये प्रवचन एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं,। इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि कैसे नशे का धुआं देश के भविष्य को राख कर रहा है और क्यों जीवन की आपाधापी में एक सद्गुरु का होना अनिवार्य है।

जीते-जी मुखाग्नि
मुखाग्नि किसे कहते हैं? जो मुर्दे की चिता को दी जाती है, वह नहीं बल्कि वह है जब कोई बीड़ी-सिगरेट पीता है और उसके मुख में जो अग्नि होती है वही मुखाग्नि है। मतलब साफ है बीड़ी-सिगरेट पीने वाला अपने को जीते जी मुखाग्नि दे रहा है। देश के युवाओं के कंधों पर स्वॢणम भारत के निर्माण की जिम्मेदारी है अत: वे ध्यान दें कि भारत का निर्माण धुएं के छल्ले उड़ाने से नहीं अपितु कठोर परिश्रम से हो सकता है।

चुप रहने की आदत डालिए
जवान और बुजुर्गों के लिए मेरी एक नसीहत है, अगर आप जवान हैं तो आप अपने क्रोध को मंद रखें नहीं तो आपका करियर चौपट हो जाएगा और अगर आप बुजुर्ग हैं तो क्रोध करना एकदम बंद कर दें वरना आपका बुढ़ापा बिगड़ जाएगा। क्रोध के तेवर कम करना है तो चुप रहने की आदत डालिए। बड़ा मजा आएगा। क्रोधी थोड़ी देर फूं-फां करके खुद-ब-खुद ढीला पड़ जाएगा।

जिंदगी में ब्रेक
जैसे गाड़ी में ब्रेक जरूरी है वैसे ही जिंदगी में भी ब्रेक जरूरी है। गुरु जिंदगी की गाड़ी का ब्रेक है। बिना ब्रेक के गाड़ी बेकार है और बिना गुरु के जिंदगी बेकार है। जिंदगी में एक गुरु जरूरी है, फिर चाहे वह मिट्टी का द्रोणाचार्य ही क्यों न हो। गुरु एक तरह से फैमिली डॉक्टर है जो मन का इलाज करता है। तन भी कभी-कभार बीमार होता है पर मन तो सदा बीमार है। इसकी औषधि गोली नहीं, सद्गुरु की बोली है।
जीवन का गणित
आज को सफल बनाओ, कल अपने आप ही सफल हो जाएगा। जन्म को सुधारो, मृत्यु अपने आप ही सुधर जाएगी। जीवन का गणित कुछ उल्टा है। जीवन के गणित में वर्तमान को सुधारो तो भविष्य सुधरता है और जीवन को सुधारो तो मृत्यु सुधरती है। संसारी और संत में इतना ही अंतर है कि संत आज को सफल बनाने में व्यस्त है और संसारी कल को सफल बनाने में मस्त है।

