Mayuranathaswami Temple: जहां माता पार्वती ने मोर रूप में स्थापित किया शिवलिंग, जानें मयूरनाथ मंदिर की पौराणिक कथा और इतिहास
punjabkesari.in Friday, Feb 13, 2026 - 08:59 AM (IST)
Mayuranathaswami Temple History in Hindi: तमिलनाडु को “मंदिरों की भूमि” कहा जाता है। अरुणाचलेश्वर, चिदंबरम नटराज और मीनाक्षी अम्मन जैसे प्रसिद्ध मंदिरों के बीच मयूरनाथ स्वामी मंदिर अपनी प्राचीनता, अनूठी पौराणिक कथा और भव्य द्रविड़ वास्तुकला के कारण विशेष पहचान रखता है। यह मंदिर तमिलनाडु के नागपट्टिनम जिले के मैलादुथुराई (पूर्व में मायावरम) नगर में स्थित है और शिव भक्तों के लिए एक प्रमुख आस्था केंद्र माना जाता है।
‘मयूरनाथ’ नाम की अनोखी कथा
मयूरनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भगवान शिव की पूजा ‘मयूरनाथ’ (मोर के स्वामी) रूप में की जाती है।
पुराणों के अनुसार, देवी पार्वती ने मोर (मयूर) के रूप में तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की थी। कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति के यज्ञ में हुए अपमान के बाद देवी पार्वती ने आत्म-शुद्धि और प्रायश्चित के लिए कठोर तप किया। कहा जाता है कि अपने अगले जन्म में उन्होंने मोर रूप धारण कर भगवान शिव की आराधना की और शिवलिंग स्थापित किया।
इसी कारण ‘मयूर’ (मोर) और ‘नाथ’ (शिव) शब्दों से मिलकर इस मंदिर का नाम मयूरनाथ पड़ा। मंदिर में देवी पार्वती की पूजा अभयम्बिका और अभयप्रदम्बिका रूपों में की जाती है।
चोल काल में हुआ निर्माण
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, मयूरनाथ मंदिर का निर्माण 9वीं शताब्दी ईस्वी में चोल राजाओं के शासनकाल में हुआ था।
मंदिर की प्रमुख विशेषताएं:
भव्य नौ मंजिला राजगोपुरम
उत्कृष्ट पत्थर की नक्काशी
द्रविड़ शैली की वास्तुकला
सुंदर मूर्तिकला और शिलालेख
मंदिर की संरचना उस समय की कलात्मक और स्थापत्य प्रतिभा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।
दक्ष यज्ञ और मोर की कथा
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, दक्ष यज्ञ के दौरान यज्ञकुंड में एक मोर का बच्चा भयभीत होकर देवी पार्वती की गोद में आ छिपा। उस प्राणी की रक्षा के लिए देवी ने तपस्या की। तप के प्रभाव से उन्हें अगले जन्म में मोर रूप धारण करना पड़ा और उन्होंने शिवलिंग स्थापित कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त किया। यह कथा भक्ति, करुणा और आत्म-शुद्धि का संदेश देती है।
बरगद के नीचे की तपस्या और पवित्र संगम
मान्यता है कि मंदिर परिसर में स्थित एक बरगद के वृक्ष के नीचे देवी पार्वती ने तपस्या की थी। इसके पास बहने वाली कावेरी नदी और वृषभ तीर्थ के संगम को ‘दक्षिणा त्रिवेणी संगम’ कहा जाता है। धार्मिक विश्वास है कि पूर्णिमा के दिन यहां स्नान करने से पापों का नाश होता है और मानसिक शांति मिलती है।
प्रमुख उत्सव और धार्मिक महत्व
महाशिवरात्रि, कार्तिक मास और अन्य महत्वपूर्ण पर्वों के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और भव्य उत्सव आयोजित किए जाते हैं। इन अवसरों पर देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में शिव नाम जप, रुद्राभिषेक और विशेष अनुष्ठान भक्तों को आध्यात्मिक आनंद प्रदान करते हैं।
मयूरनाथ स्वामी मंदिर केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि भक्ति, श्रद्धा और आत्मचिंतन का जीवंत केंद्र है। माता पार्वती की तपस्या और शिवलिंग स्थापना की कथा इसे अन्य शिव मंदिरों से अलग और विशेष बनाती है।
तमिलनाडु की आध्यात्मिक यात्रा में यह मंदिर शिव भक्तों और संस्कृति प्रेमियों के लिए अवश्य देखने योग्य स्थान है।
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
