Makar Sankranti Significance in Hindu Scriptures: शास्त्रों से जानें, क्या है मकर संक्रांति का शास्त्रीय महत्व
punjabkesari.in Wednesday, Jan 14, 2026 - 10:44 AM (IST)
Makar Sankranti Significance in Hindu Scriptures: मकर संक्रांति का शास्त्रों में अत्यधिक महत्व है। भगवान सूर्य नारायण के मकर राशि में संचार करने पर इस पर्व को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायन देवताओं का दिन है तथा दक्षिणायन देवताओं की रात्रि होती है। मकर संक्रांति के दिन से भगवान सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण गति करने लगते हैं। यह समय आध्यात्मिक उन्नति और शुभ कार्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इस दिन से देवताओं का छह माह का दिन आरंभ होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है।

यह समय दान के लिए विशेष महत्व रखता है। इस समय पवित्र नदियों में किया गया स्नान सभी पापों से मुक्ति दिलवाने वाला होता है। सूर्य भगवान जब उत्तरायण में होते हैं, उस समय किए गए समस्त शुभ कार्य विशेष लाभ देने वाले माने जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु के चरणों से निकली देवी गंगाजी भागीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं और भगीरथ के पूर्वज महाराज सगर के पुत्रों को मुक्ति प्रदान हुई थी।
महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन अपने पूर्वजों का गंगाजल, अक्षत, तिल से श्राद्ध तर्पण किया था इसीलिए इस दिन गंगासागर में कपिल मुनि के आश्रम पर एक विशाल मेला लगता है।

इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस वर्ष मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जाएगी। इस दिन पवित्र नदी में स्नान के बाद सूर्य पूजा करने वालों को आरोग्य, धन, सुख, समृद्धि और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसीलिए यह समय जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए विशेष है।
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनर्जन्म लेना पड़ता है। गीता जी के अनुसार उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता है। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने भी बाण लगने के पश्चात प्राण त्यागने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी ताकि उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। मकर संक्रांति के दिन दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

‘संक्रांति’ का अर्थ है सूर्य देव का एक राशि से दूसरी राशि में जाना। अत: वह राशि जिसमें सूर्य देव प्रवेश करते हैं, संक्रांति की संज्ञा से विख्यात है। मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं।
मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व उत्तर भारत का प्रसिद्ध लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है। यह पर्व शीत ऋतु के विदा होने तथा रबी की फसलों के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।

