Mahashivratri 2026: 108 बार जन्म लेने के बाद माता पार्वती बनी थी भगवान शिव की अर्धांगिनी, पढ़ें अद्भुत कथा
punjabkesari.in Tuesday, Feb 10, 2026 - 01:39 PM (IST)
Mahashivratri 2026: हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला महाशिवरात्रि पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पावन विवाह का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व शिवभक्तों के लिए सबसे महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक रूप से फलदायी माना जाता है। साल 2026 में महाशिवरात्रि 15 फरवरी को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यही वह तिथि है जब शिव और शक्ति का दिव्य मिलन हुआ था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस विवाह के लिए माता पार्वती को 108 बार जन्म लेना पड़ा था? यह कथा न सिर्फ भक्ति और तपस्या का उदाहरण है, बल्कि शिव-शक्ति के अटूट प्रेम और समर्पण को भी दर्शाती है।

108 जन्मों की अद्भुत कथा
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 जन्म लिए। इससे पहले वे प्रजापति दक्ष की पुत्री सती के रूप में जन्मी थीं। सती ने पिता की इच्छा के विरुद्ध जाकर भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष चाहते थे कि सती का विवाह भगवान विष्णु से हो, लेकिन सती का मन और आत्मा महादेव में ही रमी थी।

दक्ष यज्ञ और सती का त्याग
भगवान शिव के प्रति अपने अहंकार और विरोध के कारण दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपनी पुत्री सती और दामाद शिव को नहीं बुलाया। सती बिना आमंत्रण के यज्ञ में पहुंचीं, जहां उनका और भगवान शिव का अपमान किया गया। पति के अपमान से आहत होकर सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

शिव का क्रोध और वैराग्य
सती के बलिदान की सूचना मिलते ही भगवान शिव क्रोध से भर उठे। उन्होंने अपने जटाजूट से वीरभद्र को उत्पन्न किया और दक्ष यज्ञ का विध्वंस करवा दिया। इसके बाद शिव वर्षों तक वैराग्य में लीन रहे और संसार से विरक्त हो गए।

108वां जन्म और कठोर तपस्या
इसके बाद सती ने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में 108वां जन्म लिया। नारद मुनि के मार्गदर्शन में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अंततः फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को उनसे विवाह किया।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश
महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम, धैर्य और तपस्या से ही पूर्णता प्राप्त होती है। यह पर्व शिव-शक्ति के संतुलन, त्याग और भक्ति का प्रतीक है।

