महाभारत: जब द्रौपदी भीष्म पितामह पर हंसी, पढ़ें कथा

11/16/2019 10:08:27 AM

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

जब पांडव हस्तिनापुर के सम्राट बन गए थे तो द्वारिकाधीश सब पांडवों के साथ भीष्म पितामह के पास आए और गत 54 दिन की शरशैया पर लेटे भीष्म पितामह से विनम्र निवेदन किया, ‘‘बाबा आपके पांडव राज्य के राजा बन गए हैं इनको बताओ कैसे राज्य का निर्वहन करें।’’

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पितामह ने इशारे से युधिष्ठिर को अपने पास बुलाकर कहा-पाप कभी करना नहीं, पाप होते कभी देखना नहीं।’’ 

यह सुन कर दूर खड़ी द्रौपदी हंसी और खामोश हो गईं। बाबा ने अनावश्यक हंसी का कारण पूछा। द्रौपदी ने कहा, ‘‘बाबा बस यूं ही।’’ 

नहीं तेरे जैसी सबल, सुशील स्त्री यूं ही नहीं हंसती। बताओ, जब तक बताओगी नहीं, मैं अपने प्राणों का त्याग नहीं करूंगा।

तब हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक पांचाली ने कहा, ‘‘बाबा आपने भी पाप होते हुए देखा। अब आपको यह उपदेश देने का अधिकार नहीं है क्योंकि आपने भी पाप किया है।’’ 

बेटा मुझे मेरे सभी जन्मों की याद है। तो फिर कौन से पाप की बात कर रही हो?

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द्रौपदी बोली, ‘‘भरी सभा में दु:शासन मेरे बाल खींचकर लेकर आया था क्या वह पाप नहीं था? दुष्ट दुर्योधन मेरे अंगवस्त्रों का हरण कर रहा था, मैं रोती रही, बिलखती रही, आपके आगे बाबा मुझे बचाओ, मेरी रक्षा करो, तब आपका यह धर्म उपदेश कहां था? क्यों नहीं उनको आपने इस बात के लिए रोका? सब देख कर भी अपने नेत्र नीचे कर लिए क्यों? यदि मैं आपकी बेटी होती, आप जैसा योद्धा एक बार भी इशारा कर देता तो दुर्योधन की हिम्मत नहीं थी कि वह मुझे छू भी जाता, आपने ऐसा क्यों नहीं किया बाबा? 

बस करो, तुम क्या समझती हो, कि तेरे पति अर्जुन के बाणों से मैं शरशैया पर लेटा हूं, पर मेरी ही इच्छा थी। अर्जुन में इतनी हिम्मत कहां कि मेरी इच्छा के विरुद्ध एक भी बाण मुझे छू जाए। यह उसी पाप का ही तो फल है। जैसा खाओ अन्न, वैसा हो मन। दुष्ट दु:शासन, दुर्योधन आदि का प्रदूषित अन्न खाने से मेरी बुद्धि भ्रष्ट और दूूषित हो गई और अन्न का प्रभाव कहा जाता है। मेरा सारा दूषित रक्त बाणों की नुकीली धार के चलते सब बह गया, अब मैं विरक्त हो गया हूं। इसलिए कह रहा हूं कि पाप कभी करना नहीं पाप होते कभी देखना नहीं।  

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Niyati Bhandari

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