Mahabharat Katha : महाभारत की अनसुनी कथा, हनुमान जी के सामने क्यों झुक गया अर्जुन का अहंकार ?
punjabkesari.in Saturday, Jan 17, 2026 - 01:20 PM (IST)
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Mahabharat Katha : एक समय ऐसा आया जब अर्जुन अपने अद्वितीय धनुर्विद्या-कौशल पर अत्यधिक गर्व करने लगे। अभ्यास और विजय ने उनके भीतर यह विश्वास जगा दिया कि उनसे बढ़कर धनुर्धर कोई नहीं है। धीरे-धीरे यह आत्मविश्वास सीमा लांघकर अहंकार का रूप लेने लगा, जो उनके व्यवहार और वाणी में स्पष्ट दिखाई देने लगा। श्रीकृष्ण यह भली-भांति समझ चुके थे कि अर्जुन का यह भाव उनके लिए घातक हो सकता है। इसलिए उन्होंने अर्जुन के अहंकार को दूर करने के लिए एक विशेष योजना बनाई और इसके लिए पवनपुत्र हनुमान को माध्यम चुना।
हनुमान द्वारा अर्जुन की परीक्षा
एक अवसर पर अर्जुन और हनुमान का सामना हुआ। हनुमान ने विनम्रता से अर्जुन की प्रशंसा की, पर साथ ही उनके कौशल की परीक्षा लेने की इच्छा भी प्रकट की। उन्होंने कहा कि वे आकाश में विचरण करेंगे और अर्जुन उन पर बाण चलाएँ। अर्जुन को पहले संकोच हुआ, लेकिन अपने कौशल पर अटूट विश्वास होने के कारण वे तैयार हो गए।

कथा के अनुसार, दिनभर प्रयत्न करने के बाद भी अर्जुन का कोई भी बाण हनुमान को स्पर्श तक न कर सका। अंत में हनुमान ने अर्जुन से कहा कि वे स्वयं को जितना महान समझते हैं, वास्तव में उतने नहीं हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अपने जीवन में उन्होंने केवल एक ही धनुर्धर को वास्तव में अद्वितीय पाया थामेघनाद, जिसके बाणों से वे स्वयं भी कभी घायल हुए थे। यह सुनकर अर्जुन का अहंकार चकनाचूर हो गया और उन्हें अपनी सीमाओं का आभास हुआ।
रामेश्वरम में हुई पहली भेंट
अर्जुन और हनुमान की पहली मुलाकात से जुड़ी एक और प्रसिद्ध कथा है। जब अर्जुन रामेश्वरम पहुंचे और उन्होंने राम सेतु को देखा, तो उनके मन में विचार आया कि भगवान श्रीराम जैसे महान धनुर्धर ने पत्थरों का पुल क्यों बनवाया, बाणों से सेतु क्यों नहीं बनाया। उसी समय एक वृद्ध वानर के रूप में हनुमान वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने अर्जुन से कहा कि बाणों से बना सेतु वानर सेना का भार नहीं सह पाएगा। यह बात अर्जुन को चुनौती जैसी लगी और उन्होंने शर्त रख दी कि वे ऐसा सेतु बनाएँगे, जिस पर वह वानर स्वयं चल सके। यदि सेतु टूट गया, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे। अर्जुन ने बाणों से पुल बनाया लेकिन जैसे ही वानर ने उस पर कदम रखा, सेतु डगमगा कर टूट गया। अर्जुन अपनी प्रतिज्ञा निभाने को तत्पर हो गए, तभी श्रीकृष्ण प्रकट हुए और उन्हें रोक लिया। उसी क्षण अर्जुन को ज्ञात हुआ कि वह वृद्ध वानर कोई और नहीं, स्वयं हनुमान थे।

कथा से मिलने वाली शिक्षा
इन घटनाओं के माध्यम से अर्जुन को यह गहन शिक्षा मिली कि महानता केवल कौशल या शक्ति में नहीं होती, बल्कि विनम्रता और आत्मबोध में भी निहित होती है। अहंकार चाहे कितना ही सूक्ष्म क्यों न हो, वह श्रेष्ठतम योद्धा को भी मार्ग से भटका सकता है और समय पर मिला ज्ञान ही उसे सही दिशा में लौटा सकता है।

