माघ स्नान के लिए प्रयागराज में होती है विशेष तैयारी, यहां जानें पूरी जानकारी

2020-01-10T16:15:11.887

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
जैसा कि सब जानते ही हैं कि पौष मास की पूर्णिमा आज मनाई जा रही है और इसी के साथ ही माघ स्नान भी आज से शुरू हो जाते हैं, जोकि महाशिवरात्रि तक चलते हैं। माघ मेला के दौरान पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। वहीं प्रयागराज में विशाल मेले का आयोजन भी होता है। माघ के महीने में स्‍नान, दान और ध्‍यान का विशेष महत्‍व होता है। मान्यताएं कहती हैं कि भगवान नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आज हम आपको इस दिन से जुड़ें इतिहास के बारे में बताने जा रहे हैं-
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प्रयागराज भारत के सर्वाधिक पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। प्रयाग का माघ मेला विश्व का सबसे बड़ा मेला है। हिंदू पुराणों के अनुसार, भगवान ब्रह्मा द्वारा इसे ‘तीर्थ राज’ अथवा तीर्थस्थलों का राजा कहा गया है, जिन्होंने तीन पवित्र नदियों गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती के संगम पर ‘प्राकृष्ठ यज्ञ’ संपन्न किया था।
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पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन में अमृत कलश के निकलने पर देवताओं और असुरों का बहुत बड़ा संग्राम हुआ था। देवराज इंद्र अमृत कलश छिपाने के लिए पृथ्वी के चारों तरफ भागे, जिसमें से अमृत की कुछ बूदें हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में गिर गई थीं। इसके बाद उस कलश को भगवान विष्णु को दे दिया गया। तभी से इन चारों जगहों पर स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।
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माघ मेले की एक और कथा पद्म पुराण में मिलती है। जिसके अनुसार, भृगु देश की कल्याणी नामक ब्राह्मणी को बचपन में ही वैधव्य प्राप्त हो गया था। इससे वह रेव कपिल के संगम पर जाकर तप करने लगी। इस दौरान कल्याणी ने 60 माघों का स्नान किया था और अंत में अपने प्राण वहीं त्याग दिए थे, लेकिन माघ मास में स्नान के पुण्य से वह परम सुंदरी अप्सर तिलोत्तमा के रूप में अवतार लेकर इंद्रलोक चली गई। शास्त्रों में कल्प अर्थात वेदाध्ययन, मंत्रपाठ एवं यज्ञ आदि कर्म करना। पुराणों में माघ मास में संगम के तट पर निवास कर, धार्मिक कर्म करने को कल्पवास कहा जाता है। एक माह तक चलने वाले कल्पवास के दौरान हर दिन पवित्र नदी में स्नान, यज्ञ, दान, अर्घ्य आदि कर ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। 
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