Magh Mela 2026: माघ मेले में पहली बार कल्पवास करने पहुंचे किन्नर अखाड़ा के सदस्य

punjabkesari.in Saturday, Jan 10, 2026 - 11:43 AM (IST)

Magh Mela 2026:  माघ मास में कल्पवास का विशेष महत्व है। यह एक प्रकार की साधना है, जो पूरे माघ मास के दौरान संगम और अन्य पवित्र नदियों के तट पर की जाती है, लेकिन इसके नियम इतने सरल नहीं हैं। कल्पवास स्वेच्छा से लिया गया एक कठोर संकल्प है। इसके प्रमुख नियम हैं। दिन में एक बार स्वयं पकाया हुआ स्वल्पाहार अथवा बिना पकाया हुआ फल आदि का सेवन करना, ताकि भोजन पकाने के चलते साधक हरि आराधना से विमुख न हो जाए।

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प्रमुख पर्वों पर उपवास रखना, दिन भर में तीन बार गंगा, यमुना अथवा त्रिवेणी संगम में स्नान करना, त्रिकाल संध्या वंदन, भूमि शयन और इंद्रिय शमन, ब्रह्मचर्य पालन, जप, हवन, देवार्चन, अतिथि देव सत्कार, गो-विप्र, संन्यासी सेवा, सत्संग, मुंडन एवं पितरों का तर्पण करना।

सामान्यत: गृहस्थों के लिए तीन बार गंगा स्नान को श्रेयस्कर माना गया है। विरक्त साधु और संन्यासी भस्म स्नान अथवा धुलि स्नान करके भी स्वच्छ रह सकते हैं। कल्पवास गृहस्थ और संन्यास ग्रहण करने वाले स्त्री-पुरुष सभी कर सकते हैं, लेकिन उनका कल्पवास तभी पूर्ण होता है, जब वे सभी नियमों का पालन पूर्ण आस्था और श्रद्धा के साथ करेंगे।

कल्पवास का महत्व तमाम पुराणों में भी वर्णित है। माघ मास पर्यंत चलने वाले कल्पवास के दौरान शीत अपने प्रचंड रूप में होती है, लेकिन हवन के समय को छोड़कर अग्नि सेवन पूर्णत: वर्जित है। कल्पवास के दौरान गृहस्थों को शुद्ध रेशमी अथवा ऊनी, श्वेत अथवा पीत वस्त्र धारण करने की सलाह शास्त्र देते हैं। कल्पवास सभी स्त्री एवं पुरुष बिना किसी भेदभाव के कर सकते हैं।

विवाहित गृहस्थों के लिए नियम है कि पति-पत्नी दोनों एक साथ कल्पवास करें। विधवा स्त्रियां अकेले कल्पवास कर सकती हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस प्रकार का आचरण कर मनुष्य अपने अंत:करण एवं शरीर दोनों का कायाकल्प कर सकता है।

एक कल्पवास का पूर्ण फल मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर, कल्पवासी के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

कुछ जगह कल्पवास का पौष शुक्ल एकादशी से आरंभ होकर माघ शुक्ल द्वादशी पर्यन्त एक मास तक का विधान है, जबकि कुछ लोग इसका पौष पूर्णिमा से आरंभ करते हैं।

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पहली बार कल्पवास करने पहुंचे हैं किन्नर अखाड़ा के सदस्य
खास बात है कि इस वर्ष पहली बार किन्नर अखाड़े के 25 संत माघ मेले के दौरान अपना शिविर लगाकर पूर्ण विधि-विधान से कल्पवास कर रहे हैं। किन्नर अखाड़ा ने भारतीय समाज में अपनी अनूठी पहचान बनाई है जिसके कारण यह ध्यान आकर्षित करता है।
किन्नर अखाड़े की स्थापना 2016 के सिंहस्थ कुम्भ से पहले अक्तूबर 2015 में हुई थी। तब से यह अखाड़ा लगातार बढ़ रहा है। अखाड़े ने अब तक कई महामंडलेश्वर और मंडलेश्वर भी बनाए हैं। यह अखाड़ा  किन्नरों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी कार्य करता है।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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