सोनागाछी 'रैडलाइट एरिया' के पूजनीय हैं भगवान कार्तिकेय

2019-11-21T09:51:01.047

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
कोलकाता के रैडलाइट एरिया में कार्तिक पूजा के दिन हर तरफ एल.ई.डी. लाइट्स जगमगा रही थीं। इसके साथ-साथ ढोल पर थाप पड़ रही थी तथा बैंजो से धुनें निकल रही थीं। उत्तरी कोलकाता के सोनागाछी जिले के रैडलाइट एरिया की इमामबख्श लेन में ज्यादातर पुराने घर हैं, जिनमें से कुछेक एक सदी पुराने हैं। यहां पर लड़कियों का झुंड साडिय़ों, लैंगिंग्स तथा नाइटीज में दिखाई दे रहा था। कुछ क्षेत्रों के प्रवेश द्वार एल.ई.डी. लाइटों से जगमगा रहे थे। प्रवेश द्वार से अंदर की तरफ जाने पर हमको छोटे कमरे तथा वेश्याओं के कार्यस्थल देखने को मिलते हैं। यहां की गलियां जोरदार ड्रम बीट्स की धमक से डोल रही थीं। यहां की महिलाएं हल्के सफेद रंग की साड़ियों में अपने हाथों में दीए लिए हुए थीं। 
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पंडाल में स्थापित होती है कार्तिकेय की मूर्ति
सड़क के बीचों-बीच एक पंडाल था जहां पर कार्तिकेय भगवान की मूर्ति स्थापित थी। उसके साथ कई अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी थीं। कार्तिकेय भगवान का वाहन मोर भी दिखाई दे रहा था। 65000 वेश्याओं की कमेटी की सचिव काजल बोस का कहना है कि यह पूजा विशेष तौर पर साल के अंत में मनाई जाती है। कार्तिकेय की पूजा प्रत्येक इमारत के तीन-चार निवासियों द्वारा की जाती है। 3 दिनों तक यह उत्सव चलता रहा और इस पूजा का 30 से 40 हजार का बजट होता है क्योंकि वेश्याओं की कमाई इस वर्ष कम हुई है इसलिए उनका बजट भी कम हुआ है। इसके लिए हम प्रधानमंत्री को दोषी मानते हैं।

अधिकतर हैं मुस्लिम महिलाएं
यहां पर 10 से 12 हजार महिलाएं रहती हैं, जिनमें से अधिकतर मुस्लिम हैं, आबिदा बीबी उनमें से एक है, जो अब धंधे से मुक्त हो चुकी है। आबिदा का ताल्लुक पड़ोसी इलाके रामबगान से है। सभी महिलाओं पर वह निगरानी रखती है। यहां पर जात-पात को छोड़ सभी महिलाएं कार्तिकेय की पूजा करती हैं। पिछले 4 वर्षों से पूजा कर रहे 71 वर्षीय खगेन्द्रनाथ मुखर्जी का कहना है कि बंगाल में कार्तिकेय भगवान की पूजा मुख्य तौर पर बेऔलाद महिलाओं द्वारा की जाती है मगर सोनागाछी में यह पूजा सभी महिलाओं द्वारा की जाती है। 
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कार्तिकेय की मां बनने का चुनाव करती है एक लड़की
काजल बोस का कहना है कि एक लड़की अपने आपको कार्तिकेय की मां बनने का चुनाव करती है तथा पूजा आयोजित करती है। वह अपने किसी नजदीकी व्यक्ति को पिता के तौर पर पेश करती है। इस तरह मां तथा पिता का उन्हीं में से चुनाव होता है। वह कार्तिकेय के माथे तथा गालों पर सिंदूर लगाती है। इसके बाद अपने गालों पर भी सिंदूर लगाया जाता है। उसके बाद महिलाएं अन्य पड़ोसी महिलाओं को भी पूजा के लिए आमंत्रित करती हैं। इस दौरान अपने घरों को छोड़ कर वे जलूस की शक्ल में बैंडबाजे के साथ नजदीक के शीतला मंदिर में जाती हैं। वहां से अपने घरों को पुरोहित द्वारा चावल के पेस्ट के साथ बनाई गई 'सिरी को लेकर आती हैं, जिसके साथ सिंदूर भी रखा जाता है।

सायं में यह जलूस हुगली की तरफ बढ़ता है। वहां पर ये महिलाएं स्नान करती हैं और एक कलश को जल से भर कर अपने सिर पर रख कर घरों को लौट जाती हैं। यह एक बहुत पुरानी परम्परा है। एक स्थानीय निवासी दलीप साहा, जोकि काटवा कालेज तथा बर्धमान यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं, का कहना है कि कार्तिकेय पूजा से सभी काटवा निवासी परिचित हैं। ट्रेनों के आने से पहले नाडिया, बीरभूम तथा मुर्शिदाबाद जिलों के व्यापारी परिवहन के लिए जलमार्गों का इस्तेमाल करते थे।


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