Lohri Festival 2026: आज मनाई जा रही है लोहड़ी, जानें इतिहास, गीत और परंपराएं
punjabkesari.in Tuesday, Jan 13, 2026 - 02:52 PM (IST)
Lohri Festival 2026: कुछ लोगों का मानना है कि ‘लोहड़ी’ शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों लोह (लोहा) और अरी (आरी) के मेल से हुई है वहीं कुछ मानते हैं कि लोहड़ी शब्द तिलोहड़ी, अर्थात तिल और रोहड़ी (गुड़) के संयोजन से आया है। त्यौहार के दौरान सूर्य भगवान का आभार व्यक्त करने के लिए गुड़ की गजक और तिल की रेवड़ी जैसे खाद्य पदार्थ अग्नि में अर्पित किए जाते हैं।

परंपरागत रूप से माना जाता है कि जिस रात लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है, वह वर्ष की सबसे लंबी रात होती है, जिसे शीतकालीन संक्रांति भी कहा जाता है। त्यौहार का मुख्य आकर्षण सूर्यास्त के बाद उत्सवाग्नि (बॉनफायर) प्रज्वलित करना होता है। यह पवित्र अग्नि नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के माता-पिताओं के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है।
देवताओं का आशीर्वाद लेने के लिए ऐसे नवविवाहित जोड़े और माता-पिता उत्सवाग्नि की परिक्रमा करते हैं और अग्नि में गजक (सर्दियों का एक मीठा पकवान), पॉपकॉर्न और लाई जैसे प्रसाद डालते हैं।

लोककथाओं के अनुसार लोहड़ी के दिन इस उत्सवाग्नि की लपटें लोगों की प्रार्थनाओं को सूर्य देवता तक ले जाती हैं। माना जाता है कि देवता प्रसन्न होकर पृथ्वी को समृद्ध फसल का आशीर्वाद प्रदान करेंगे तथा ठंड व भीषण सर्दियों को भी समाप्त करेंगे।
एक किंवदंती के अनुसार लोहड़ी के त्यौहार के पीछे धुल्ला भट्टी की लोकप्रिय पौराणिक कथा है, जिन्हें अपहृत लड़कियों को बचाने और उनके विवाह की व्यवस्था करने के लिए नायक के रूप में जाना जाता था। त्यौहार के एक हिस्से के रूप में, लोहड़ी की रात से कुछ दिन पहले, युवा लड़के और लड़कियां घर-घर जाकर गीत गाते हैं और पैसे, मिठाई व अन्य खाद्य पदार्थ इक_ा करते हैं। धुल्ला भट्टी द्वारा बचाई गईं सुंदरी और मुंदरी नामक दो लड़कियों के बारे में गाया जाने वाला पौराणिक गीत है :
सुंदर मुंदरिये हो! तेरा कौन विचारा हो!
दुल्ला भट्टी वाला हो! दुल्ले धी व्याही हो!
सेर शक्कर पाई हो! कुड़ी दे जेबे पाई!
कुड़ी दा लाल पटाका हो! कुड़ी दा सालू पाटा हो!
सालू कौन समेटे हो! चाचे चूरी कुट्टी हो!
जमींदारां लुट्टी हो! जमींदार सदाए हो!
गिन-गिन पोले लाए हो! इक पोला रह गया!
सिपाही फड़ के लै गया! सिपाही ने मारी ईंट!
भावें रो भावें पिट्ट। सानू दे दे लोहड़ी।
तुहाड़ी बनी रवे जोड़ी!

लोहड़ी के दौरान पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपी जाने वाली विधियों पर आधारित होते हैं। कुछ प्रसिद्ध व्यंजन हैं सरसों का साग-मक्की की रोटी, पिन्नियां, गुड़ की गजक और तिल के लड्डू, पंजीरी तथा मखाने की खीर।
लोहड़ी के दौरान खाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजनों के सेवन की विशिष्ट परम्परा होने के साथ-साथ उनके आहार संबंधी महत्व भी हैं। उदाहरण के लिए वहां की एक परम्परा है कि लोहड़ी के एक दिन बाद सरसों का साग खाया जाता है।
इस परम्परा का प्रमाण एक लोकप्रिय पंजाबी कहावत में मिलता है ‘पोह रिद्धि, माघ खड्डी’ जिसका अर्थ है, पंजाबी कैलेंडर के अनुसार, भोजन (साग) को पोह (पूष) के महीने में तैयार किया जाना चाहिए, और इसके अगले दिन, यानी माघ मास में खाया जाना चाहिए।
लोहड़ी के सर्दी के महीने में पंजीरी का सेवन किया जाता है क्योंकि इसमें मेवा और बीज जैसे पोषक तत्व, और इलायची और दालचीनी जैसे मसाले होते हैं, जो शरीर को गर्म रखते हैं।
मेवों, बीजों, विभिन्न अनाजों के आटे, गुड़, खाद्य गोंद और घी से मिलकर बनाई पंजीरी कैल्शियम, ओमेगा 3 जैसी लाभकारी वसा, विटामिन ई, लोहा, और मैग्नीशियम की समृद्ध स्रोत है, जो शरीर को दर्द से राहत देते हैं और मांसपेशियों और जोड़ों को आराम देते हैं। पंजीरी को उन महिलाओं के लिए भी पोषण का बड़ा स्रोत माना जाता है, जिन्होंने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया है।
यह एक दिलचस्प बात है कि पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल के दौरान उनके शानदार लाहौर दरबार में भी लोहड़ी मनाई जाती थी। कहा जाता है कि इस मौके पर महाराजा की पोशाक पीले रंग की होती थी।
लोहड़ी पंजाब के लोगों के लिए एक त्यौहार से बढ़कर है, यह उनके उद्यम और उनकी संस्कृति का उत्सव है, जिसे उत्साह के साथ मनाया जाता है।

