Korean and Chinese culture: जब चीनी ड्रामे जीत रहे दुनिया का दिल, फिर योग, संगीत और संस्कृति का देश भारत पीछे क्यों!

punjabkesari.in Tuesday, Oct 27, 2026 - 10:46 AM (IST)

नई दिल्ली (इंट): कोरिया ने अपने संगीत और ड्रामों से दुनिया को अपना कल्चर बेचा, तो चीन अपनी सभ्यता, आधुनिकता और कहानियों के दम पर दर्शकों का दिल जीत रहा है। नैटफ्लिक्स पर चीनी ड्रामों की बढ़ती लोकप्रियता के बीच सवाल है कि योग, संगीत और समृद्ध संस्कृति वाला भारत इस दौड़ में पीछे क्यों है? 

भारतीय मनोरंजन उद्योग ने बड़े सितारों, भव्य फिल्मों और घरेलू बॉक्स ऑफिस पर लंबे समय तक ध्यान केंद्रित किया, जबकि कोरिया और चीन ने धारावाहिकों को सांस्कृतिक पहचान, जीवनशैली और वैश्विक दर्शकों से संवाद का माध्यम बनाने की दिशा में लगातार काम किया। जानकारों की मानें तो भारत में कमी कहानियों की नहीं, बल्कि उन्हें पेश करने और दुनिया तक पहुंचाने की रणनीति की है।

वैश्विक मंच पर चीन की कहानियों का उभार
मार्च, 2026 में तियान शीवेई और झांग लिंगहे अभिनीत ‘पर्स्यूट ऑफ जैड’ नैटफ्लिक्स की वैश्विक गैर-अंग्रेजी धारावाहिकों की शीर्ष 10 सूची में शामिल हुआ। अगस्त में जिंग बोरण और सुन चियान के अभिनय से सजे ‘द अर्ली स्प्रिंग’ ने दूसरे स्थान पर पहुंचकर अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों का ध्यान खींचा। इसे बीते अगस्त माह के एक सप्ताह में 24 लाख बार देखा गया था और देखने का कुल समय 2.15 करोड़ घंटे रहा। 

यह 22 बाजारों की साप्ताहिक शीर्ष 10 सूची में भी जगह बनाने में सफल रहा। दोनों धारावाहिकों की कहानियां अलग हैं। ‘पर्स्यूट ऑफ जैड’ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में विवाह, प्रतिशोध और राजनीतिक षड्यंत्रों के बीच प्रेम तलाशता है, जबकि ‘द अर्ली स्प्रिंग’ आधुनिक पेशेवर जीवन, महत्वाकांक्षा और छिपे रिश्तों की जटिलताओं को सामने लाता है। इनकी लोकप्रियता बताती है कि अच्छी कहानी की पहुंच भाषा और भौगोलिक सीमाओं से आगे जा सकती है।

कोरिया ने जीवनशैली बेची, चीन ने सभ्यता की खिड़की खोली
कोरियाई मनोरंजन की वैश्विक सफलता के पीछे केवल लोकप्रिय कलाकार नहीं, बल्कि संगीत, फैशन, सौंदर्य उत्पादों और जीवनशैली का व्यापक सांस्कृतिक संसार भी रहा है। ‘के-ड्रामों’ ने दर्शकों में कोरियाई भोजन, संगीत, पहनावे और शहरों के प्रति जिज्ञासा जगाई। मनोरंजन धीरे-धीरे सांस्कृतिक प्रभाव और व्यावसायिक अवसरों का माध्यम बन गया। 

चीन की राह कुछ अलग है। उसके धारावाहिक आधुनिक तकनीक, ऊंची इमारतों और महानगरीय जीवन के साथ अपनी प्राचीन सभ्यता, पारंपरिक खानपान, त्यौहारों, ऐतिहासिक स्थापत्य और क्षेत्रीय संस्कृतियों को भी सामने रखते हैं। ‘द अर्ली स्प्रिंग’, ‘लव बिटवीन लाइन्स’ और ‘पर्स्यूट ऑफ जैड’ जैसे अलग-अलग कथानकों वाले धारावाहिक दिखाते हैं कि चीनी कहानियां आधुनिकता और परंपरा को एक ही सांस्कृतिक कैनवास पर रख सकती हैं।

कहां चूक रहा है भारत...
मामले से जुड़े जानकार कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी भाषाई, धार्मिक, क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता है। छोटे शहरों से महानगरों तक का संघर्ष, जाति और वर्ग की जटिलताएं, महिलाओं की बदलती भूमिका, रोजगार की अनिश्चितता, प्रवास, पारिवारिक अपेक्षाएं और पीढ़ियों के बीच टकराव, ये सभी ऐसी कहानियां हैं जिनसे अंतर्राष्ट्रीय दर्शक भी जुड़ सकते हैं। 

इसके बावजूद भारतीय धारावाहिकों का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक पारिवारिक षड्यंत्रों, अविश्वसनीय संयोगों, अतिनाटकीय टकरावों और खिंचती हुई कहानियों में उलझा रहा है। हालांकि भारतीय टैलीविजन और डिजिटल मंचों पर कई उल्लेखनीय प्रयोग भी हुए हैं, लेकिन उन्हें वैश्विक पहचान दिलाने के लिए निरंतरता और बेहतर वितरण रणनीति की जरूरत है। समस्या पूरे भारतीय मनोरंजन उद्योग की विफलता नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली मौलिक और लगातार उपलब्ध कराई जाने वाली कहानियों की सीमित पहुंच है।

पटकथा और किरदारों की कमजोरी
रंगमंच विशेषज्ञ कहते हैं कि दर्शक अब केवल आदर्श नायक या सर्वगुण संपन्न नायिका नहीं चाहते। वे ऐसे पात्रों को भी स्वीकार करते हैं जो गलतियां करते हैं, स्वार्थी होते हैं, असफल होते हैं और अपने फैसलों से जूझते हैं। 

चीनी ड्रामों में महत्वाकांक्षी महिला, कठोर अधिकारी या विरोधाभासों से भरा प्रेमी भी कहानी का केंद्र बन सकता है। ऐसे किरदारों में जीवन की अपूर्णता दिखाई देती है। भारतीय कहानियों में भी ऐसे पात्रों की कमी नहीं, लेकिन कई व्यावसायिक प्रस्तुतियों में उन्हें नैतिक संदेश, पारंपरिक छवि या नायक की छवि बचाने के दबाव में सीमित कर दिया जाता है। जब किरदार वास्तविक मनुष्य के बजाय किसी विचार या आदर्श का पोस्टर बन जाते हैं, तो कहानी की स्वाभाविकता कमजोर पड़ती है।

केवल सितारे नहीं, कहानी भी बनाती है पहचान
उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि भारतीय मनोरंजन उद्योग में सितारों का आकर्षण और बड़े बजट की फिल्मों का महत्व निर्विवाद है, लेकिन वैश्विक दर्शकों तक पहुंचने के लिए केवल प्रसिद्ध चेहरा पर्याप्त नहीं। इसके लिए चुस्त पटकथा, सधा हुआ संपादन, सीमित और सार्थक एपिसोड, मजबूत सहायक पात्र, विश्वसनीय संवाद और ऐसी दृश्य भाषा चाहिए जो भाषा की बाधा पार कर सके। अनुवाद और डबिंग की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही भारतीय निर्माताओं को अलग-अलग देशों के दर्शकों की पसंद समझनी होगी।

भारत के पास खजाना है, जरूरत उसे खोलने की
भारत को कोरिया या चीन की नकल करने की आवश्यकता नहीं। उसकी अपनी लोकगाथाएं, ऐतिहासिक चरित्र, महानगरीय अनुभव, ग्रामीण जीवन, संगीत और सांस्कृतिक परंपराएं वैश्विक कहानियों का आधार बन सकती हैं।

जरूरत ऐसी रचनात्मक दृष्टि की है जो इन तत्वों को संग्रहालय की वस्तु की तरह नहीं, बल्कि जीवित और बदलते समाज के रूप में प्रस्तुत करे। भारत के सामने चुनौती अपने सांस्कृतिक वैभव का बखान करना भर नहीं, बल्कि ऐसी कहानियां रचना है जिन्हें दुनिया देखना चाहे, जिनके पात्र उसे अपने लगें और जिनकी दुनिया से बाहर निकलने के बाद भी उसका मन वहीं ठहरा रहे।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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