Premanand Maharaj: पति का पुण्य पत्नी को मिलता है लेकिन पत्नी का पुण्य पति को क्यों नहीं? प्रेमानंद महाराज ने दिया स्पष्ट उत्तर
punjabkesari.in Tuesday, Jan 27, 2026 - 09:08 AM (IST)
Premanand Maharaj Teachings on Husband-Wife Karma: सनातन धर्म में पति–पत्नी का संबंध केवल सामाजिक या पारिवारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, कर्म और धर्म से गहराई से जुड़ा माना गया है। इसी संदर्भ में अक्सर लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि पति के पुण्य का फल पत्नी को तो मिलता है, लेकिन पत्नी के पुण्य का फल पति को क्यों नहीं मिलता?
हाल ही में वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से एक भक्त ने यही सवाल पूछा, जिसका उन्होंने शास्त्रसम्मत और आध्यात्मिक तर्कों के साथ विस्तार से उत्तर दिया।
सनातन परंपरा में पति–पत्नी का आध्यात्मिक बंधन
हिंदू धर्म में पति–पत्नी को जन्म-जन्मांतर का साथी माना गया है। पत्नी को पति की अर्धांगिनी कहा जाता है, अर्थात वह उसके जीवन के सुख-दुख और धर्म-कर्म की सहभागी होती है। लेकिन इस सहभागिता की भी एक शास्त्रीय सीमा और व्यवस्था है, जिसे समझाना प्रेमानंद महाराज ने आवश्यक बताया।
पाणिग्रहण संस्कार का वास्तविक अर्थ
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, इस व्यवस्था का मूल विवाह के पाणिग्रहण संस्कार में निहित है। उन्होंने बताया कि विवाह के समय पति का हाथ नीचे होता है, पत्नी का हाथ ऊपर रखा जाता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि पति यह संकल्प लेता है, “आज से मैं पत्नी के जीवन, सुरक्षा और जिम्मेदारी का भार अपने ऊपर लेता हूं।”
इसी संकल्प के कारण शास्त्रों में पत्नी को पति के पुण्य का स्वाभाविक अधिकारी माना गया है।
पत्नी को पति के पुण्य का फल क्यों मिलता है?
प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि स्त्री अपना मायका, परिवार और परिचित संसार छोड़कर पति के घर आती है। वह पति के जीवन को व्यवस्थित और सुगम बनाने के लिए सेवा और त्याग करती है। जब पति तीर्थ यात्रा, दान, यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठान करता है, तो उसके पीछे पत्नी का अप्रत्यक्ष सहयोग और समर्पण होता है।
इसी कारण शास्त्रों के अनुसार, पति द्वारा किए गए शुभ कर्मों का आधा पुण्य स्वतः पत्नी को प्राप्त हो जाता है।
पत्नी का पुण्य पति को क्यों नहीं मिलता?
इस प्रश्न पर प्रेमानंद महाराज ने एक महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया। उन्होंने कहा यदि पति अधार्मिक है या गलत मार्ग पर चलता है और पत्नी एकांत में जप, तप और भक्ति कर रही है तो पत्नी के पुण्य का फल पति को नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में पति अपने कर्मों के अनुसार फल भोगेगा, जबकि पत्नी अपनी भक्ति के बल पर आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेगी।
हालांकि, यदि पति स्वयं धार्मिक और भजन करने वाला है, और पत्नी निस्वार्थ भाव से उसकी सेवा और आज्ञा का पालन करती है, तो पति की भक्ति के प्रभाव से पत्नी का भी कल्याण हो जाता है।
आध्यात्मिक उन्नति व्यक्तिगत साधना पर निर्भर
प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट किया कि पुण्य का फल सीमित रूप में साझा हो सकता है लेकिन आत्मिक उन्नति और मोक्ष व्यक्तिगत साधना से ही संभव है। कोई भी व्यक्ति केवल दूसरे के पुण्य के सहारे मोक्ष का अधिकारी नहीं बन सकता।
पाप और दंड का अलग विधान
महाराज ने यह भी बताया कि पुण्य में कुछ हद तक सहभागिता संभव है लेकिन पाप का दंड पूर्णतः व्यक्तिगत होता है। यदि पति या पत्नी एक-दूसरे के गलत कर्मों में प्रत्यक्ष सहभागी नहीं हैं, तो पति के पाप का फल पत्नी को नहीं मिलेगा और पत्नी के पाप का दंड पति को नहीं भुगतना पड़ेगा। कर्म का विधान प्रत्येक जीव के लिए अलग-अलग लागू होता है।
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, पति–पत्नी का संबंध आध्यात्मिक रूप से गहरा जरूर है, लेकिन कर्म और भक्ति का फल पूरी तरह समान नहीं होता। पत्नी को पति के पुण्य का अधिकार उसके त्याग और सेवा के कारण मिलता है, जबकि पत्नी की आत्मिक उन्नति उसके स्वयं के भजन और तप पर निर्भर करती है। यही सनातन धर्म का संतुलित और न्यायपूर्ण सिद्धांत है।
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