Karwa Chauth ka vrat kholna: करवा चौथ पर न दिखे चांद तो न हों परेशान, व्रत खोलने के लिए करें ये धार्मिक काम
punjabkesari.in Thursday, Oct 29, 2026 - 09:56 AM (IST)
Karwa Chauth ka vrat kholna: सुहागिन महिलाओं के लिए करवा चौथ का व्रत अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और सुखद दांपत्य जीवन की कामना का सबसे पवित्र पर्व माना जाता है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर दिनभर कड़ा निर्जला उपवास रखती हैं और संध्याकाल में भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता का पूजन करती हैं।
करवा चौथ के व्रत को खोलने से पहले सुहागिनें पूजा की थाल लेकर चंद्रमा के दर्शन करने के बाद छलनी से अपने पति को पूजती हैं। उनके पेर छूकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं और फिर जल पीकर व्रत को खोलती हैं। करवा चौथ की थाल के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्रियां उसमें रखी जाती हैं। आइये जानते हैं, उन सामग्रियों के बारे में जिसे करवा चौथ की थाली में रखा जाता है।

करवा और सींक रखने की विधि
करवा चौथ में मिट्टी या फिर पीतल के करवा का विशेष महत्व है। जहां करवा को भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ की करवा की टोटी को सूंड मानी जाती है। इसलिए इसमें जल भरकर चंद्रदेव को अर्घ्य देने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। करवा चौथ में कांस की सीक का विशेष महत्व है। इन्हें करवा की टोटी में लगाया जाता है। ये सींक शक्ति से संबंधित है।

करवा चौथ पूजन सामग्री
करवा चौथ के पूजन थाली में करें ये चीजें शामिल- चंदन, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मिठाई, गंगाजल, कुंकू, अक्षत (चावल), सिंदूर, मेहंदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूं, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, चलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलवा, दक्षिणा (दान) के लिए पैसे, इत्यादि।

Karva Chauth worship method करवा चौथ पूजन विधि
करवा चौथ के पूरे दिन निर्जल रहना होता है। इस दिन पूजा के लिए आठ पूरियों की अठावरी बनाएं, हलवा बनाएं साथ ही पीली मिट्टी से गौरी बनाएं और उनकी गोद में गणेश जी बनाकर बिठाएं गौरी को चुनरी ओढ़ाएं बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें। जल से भरा हुआ लोटा रखें करवा में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें। उसके ऊपर दक्षिणा रखें, रोली से करवा पर स्वास्तिक बनाएं।
गौरी-गणेश की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें। करवा पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासू जी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी की ओट से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्ध्य दें। इसके बाद पति से आशीर्वाद लें, उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन करें।
शास्त्रों के अनुसार, करवा चौथ का व्रत चंद्रमा के प्रत्यक्ष दर्शन और उन्हें अर्घ्य अर्पित किए बिना पूर्ण नहीं माना जाता। हालांकि, कई बार खराब मौसम, धुंध या अचानक बारिश की वजह से आकाश में बादलों का पहरा हो जाता है और चंद्रदेव के दर्शन पाना कठिन हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में व्रती महिलाओं के मन में संशय उत्पन्न होना स्वाभाविक है। धार्मिक मान्यताओं और पंचांगीय विधानों के अनुसार, यदि चंद्रोदय के समय आकाश में चंद्रमा दिखाई न दे, तो शास्त्रों में दिए गए इन 4 प्रामाणिक नियमों का पालन करके पूर्ण निष्ठा के साथ अपना व्रत खोला जा सकता है।
भगवान शिव को 'चंद्रशेखर' कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण किया हुआ है। यदि आकाश में चांद दिखाई न दे, तो घर के मंदिर में रखी भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र में सुशोभित चंद्रमा के दर्शन करें। यदि घर में ऐसी प्रतिमा न हो, तो निकटतम शिव मंदिर जाकर महादेव के मस्तक स्थित चंद्रमा के दर्शन कर अर्घ्य समर्पित करें और व्रत खोलें।
शास्त्रों में अक्षत (चावल) को चंद्रमा का प्रतीक माना गया है। चंद्रोदय की दिशा (पूर्व/उत्तर-पूर्व) में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएं। लाल कपड़े पर चावल के दानों से चंद्रमा की सुंदर आकृति निर्मित करें। तत्पश्चात छलनी से उस चित्रित चंद्रमा के दर्शन करें और रोली, अक्षत एवं पुष्प अर्पित कर पूजन करें। पूजन के दौरान 'ॐ चंद्राय नमः' अथवा 'ॐ सोम सोमाय नमः' मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें और विधिपूर्वक जल से अर्घ्य देकर व्रत खोलें।
चंद्रदेव का मानसिक ध्यान करते हुए उन्हें मन ही मन प्रणाम करें। इसके बाद चंद्रदेव की दिशा में जल का अर्घ्य अर्पित करें और करवा माता व चंद्रदेव से व्रत में हुई भूल-चूक की क्षमा मांगते हुए पारण करें।
वीडियो कॉल के माध्यम से उस शहर के चंद्रमा के दर्शन कर सकती हैं अथवा चंद्रमा के चित्र का दर्शन करके भी चंद्रदेव का स्मरण किया जा सकता है और जल ग्रहण कर उपवास खोला जा सकता है।

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Content Writer
Niyati Bhandari