Karva Chauth Vrat Vidhi: करवा चौथ व्रत की पारम्परिक विधि और प्रथाएं, जानें सरगी से लेकर उद्यापन तक का सम्पूर्ण विधान
punjabkesari.in Friday, Oct 23, 2026 - 12:15 PM (IST)
Karva Chauth Vrat Vidhi: कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की कर्क चतुर्थी तिथि को करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। यह निर्जल व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां अपने भावी जीवन साथी की मंगल कामना के लिए यह उपवास करती हैं। व्रत के दिन महिलाओं को सूर्योदय से पूर्व सुबह चार बजे उठकर स्नान करना चाहिए और शिव-परिवार की पूजा करके व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेते समय इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है, 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये कर्क चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'
इसके माध्यम से पति, पुत्र एवं पौत्र के सुख-सौभाग्य की इच्छा का संकल्प लेकर निर्जल व्रत का आरंभ किया जाता है।

सरगी और बया की पावन परंपरा
करवा चौथ में 'बया' और 'सरगी' का विशेष धार्मिक व पारिवारिक महत्व है। सूर्योदय से पूर्व सास अपनी बहू को 'सदा सुहागन रहो' के आशीर्वाद के साथ सरगी देती हैं। सरगी में फल, मिठाई, मेवे, मट्ठियां, फेनियां, आलू की सब्जी और पूड़ियां आदि शामिल होती हैं। यह खाद्य सामग्री दिनभर निर्जल रहने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान करती है। फल का रस प्यास से बचाव करता है, फीकी मट्ठी रक्तचाप को नियंत्रित रखती है और मेवे आने वाली सर्दी के लिए शारीरिक क्षमता बढ़ाते हैं। सरगी खाने से सास और बहू के बीच स्नेह और प्यार का रिश्ता मजबूत होता है।
सरगी से पूर्व सास के लिए 'बया' निकाला जाता है, जिसमें एक थाली में फल, मिठाई, नारियल, वस्त्र और सुहाग की सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, रिबन, मेहंदी) रखकर सास को दी जाती है और उनके चरण छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।

देवी-देवताओं का पूजन एवं सामग्री
इस अवसर पर चंद्र देव के साथ-साथ भगवान शिव, माता पार्वती, स्वामी कार्तिकेय और श्री गणेश जी की पूजा की जाती है। साथ ही गौरी पूजन का भी विशेष विधान है। पूजा स्थान पर करवा चौथ का चित्र या कैलेंडर लगाया जाता है। तांबे या मिट्टी के करवे में चावल और उड़द की दाल भरी जाती है। दान के लिए सुहाग सामग्री में कंघी, सिंदूर, चूड़ियां, रिबन और नकद रुपये रखे जाते हैं। इसके अलावा दुकानों पर विशेष रूप से तैयार मीठी और फीकी मट्ठियां बया और पूजा के लिए उपयोग की जाती हैं।

संध्या पूजन और 'करवा खेलना'
शाम के समय सभी सुहागिनें सज-धजकर एक स्थान पर एकत्रित होती हैं। महिलाएं गोल घेरे में बैठकर अपनी पूजा की थाली एक-दूसरे के साथ बांटती हैं, जिसे 'करवा खेलना' कहा जाता है। इस दौरान वे पारम्परिक करवा के गीत गाती हैं। पूजा के दौरान पंडित जी महिलाओं को करवा चौथ की कथा सुनाते हैं।

चंद्रोदय पूजन, अर्घ्य और पारण
रात को चंद्रोदय होने पर तांबे या मिट्टी के करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद महिलाएं अपने पति के हाथों जल ग्रहण कर निर्जल व्रत सम्पूर्ण करती हैं। पूजा के बाद सास के चरण छूकर आशीर्वाद लिया जाता है और उन्हें 14 पूरियां, खीर, फल, फूल, मेवा, मिष्ठान व सुहाग सामग्री भेंट की जाती है। विवाह के प्रथम वर्ष यह परंपरा निभाना सास-बहू के रिश्ते को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है।
करवा चौथ व्रत के उद्यापन की विधि
विवाहित स्त्रियां अपनी सुविधा अनुसार व्रत का उद्यापन करती हैं। उद्यापन के समय एक थाली में 4-4 पूड़ियां और हलवा रखकर सासू मां को दिया जाता है। इसके बाद तेरह ब्राह्मणों को भोजन और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। उद्यापन के अवसर पर मायके पक्ष की ओर से कटोरियों या गिलासों में चावल और चीनी भरकर, फल, मेवे व शगुन की राशि सासू मां को भेजी जाती है।

