Jivitputrika Vrat 2026 : कब रखा जाएगा जीवित्पुत्रिका व्रत, जान लें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
punjabkesari.in Saturday, Sep 26, 2026 - 04:11 PM (IST)
Jitiya Vrat 2026 : संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से रखा जाने वाला जितिया व्रत हर साल माताओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस व्रत को जिउतिया और जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन माताएं जल और अन्न त्याग कर सारा दिन निर्जला उपवास करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर साल अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रखा जाता है। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं कि अश्विन मास में यह तिथि किस दिन पड़ रही है और इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा। तो आइए जानते हैं जीवित्पुत्रिका व्रत के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में-
जीवित्पुत्रिका व्रत शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 03 अक्टूबर दिन शनिवार को सुबह 07 बजकर 59 मिनट पर होगा और इसका समापन 04 अक्टूबर दिन रविवार को सुबह 05 बजकर 51 मिनट पर होगा। ऐसे में देखा जाए तो जीवित्पुत्रिका व्रत 03 अक्टूबर दिन शनिवार को रखा जाएगा।
जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व
जीवित्पुत्रिका व्रत को माताओं के प्रेम, समर्पण और संतान के प्रति उनकी मंगलकामना से जुड़ा महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना की जाती है। साथ ही, परिवार में सुख-शांति बनी रहे, ऐसी भी मान्यता है। इस व्रत की शुरुआत एक दिन पहले नहाय-खाय की परंपरा से होती है। इस दिन व्रती स्नान और पूजा-पाठ करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले दिन जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है, जिसे कई परंपराओं में निर्जला रखने का विधान बताया गया है। नहाय-खाय के दिन भोजन को सात्विक रखने पर विशेष जोर दिया जाता है, इसलिए मांसाहारी भोजन के साथ-साथ लहसुन, प्याज और अन्य तामसिक खाद्य पदार्थों से परहेज किया जाता है।

जीवित्पुत्रिका व्रत पूजा विधि
जीवित्पुत्रिका व्रत को छठ जैसा ही महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए महिलाएं इसकी शुरुआत एक दिन पहले नहाय-खाय की परंपरा से करती हैं। इस दिन वे सात्विक भोजन बनाकर पहले पितरों को अर्पित करें और फिर कौवे और गाय आदि को खिलाएं। व्रत वाले दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान और ध्यान करें और पूरे दिन निर्जला व्रत रखें। पूजा के लिए घर के पवित्र स्थान को गोबर और मिट्टी से लिपाई कर पवित्र कर लें और वहां एक छोटा तालाब बनाएं। इसी स्थान पर कुशा से भगवान जीमूतवाहन की स्थापना करें। साथ ही, मिट्टी और गोबर से चील और सियारिन की आकृतियां बनाकर उनकी भी पूजा की जाती है। पूजन के समय भगवान जीमूतवाहन को धूप, दीप, माला, फूल, रोली, सिंदूर, फल और मिठाई अर्पित की जाती है और फिर व्रत की कथा सुने या पढ़े। अगले दिन शुभ मुहूर्त में पारण कर व्रत का समापन करें और भगवान जीमूतवाहन से संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगे।

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