जन्माष्टमी की रात 12 बजे ही क्यों काटते हैं खीरा? जानें इस परंपरा का गहरा रहस्य

punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 08:00 AM (IST)

Janmashtami Cucumber Ritual : हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव बहुत धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस साल कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत 04 सितंबर, 2026 शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से लड्डू गोपाल की पूजा करने और व्रत रखने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात 12 बजे जैसे ही भगवान कृष्ण का जन्म होता है, पूजा-अर्चना के दौरान खीरा काटने की परंपरा निभाई जाती है। इस प्रक्रिया को धार्मिक भाषा में गर्भनाल काटना कहा जाता है। यह केवल एक साधारण रीति-रिवाज नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे गहरा धार्मिक और पौराणिक मान्यता और रहस्य छिपे हुए हैं। 

Janmashtami Cucumber Ritual

गर्भनाल काटना 
जिस प्रकार एक शिशु के जन्म के बाद माता और बच्चे को जोड़ने वाली गर्भनाल को काटा जाता है, ठीक उसी तरह जन्माष्टमी पर खीरे को काटना बाल गोपाल के जन्म का प्रतीक माना जाता है। खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है और उससे जुड़े डंठल को नाल माना जाता है। रात 12 बजे डंठल को खीरे से अलग करके सांकेतिक रूप से कान्हा जी का जन्म कराया जाता है।

Janmashtami Cucumber Ritual

खीरे का चुनाव कैसा होना चाहिए?
जन्माष्टमी की पूजा में हर कोई साधारण खीरा इस्तेमाल नहीं करता। इसके लिए विशेष रूप से पत्तियों और डंठल वाले खीरे का उपयोग किया जाता है। पूजा के समय सिक्के या सुई की मदद से खीरे के डंठल को काटकर अलग किया जाता है, जिसके बाद शंखनाद और घंटे-घड़ियाल बजाकर कान्हा के जन्म की खुशियां मनाई जाती हैं।

पूजा के बाद इस खीरे का क्या करते हैं?
पूजा संपन्न होने के बाद इस खीरे को परिवार के सदस्यों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यदि इस खीरे का प्रसाद किसी गर्भवती महिला को दिया जाए, तो उसे संतान सुख की प्राप्ति होती है और होने वाला बच्चा स्वस्थ व तेजस्वी होता है।

Janmashtami Cucumber Ritual

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Content Editor

Sarita Thapa

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