मानो या न मानो: पत्ता भी नहीं हिल सकता ईश्वर की मर्जी के बिना

2020-10-26T19:18:46.157

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जीवन बहुत ही रहस्यमय है। इसे समझ पाना आसान नहीं है। यह एक अंतहीन एवं गूढ़ विषय है, अथाह सागर की तरह। इसमें जितना गोता लगाते जाएंगे, उतने ही नए-नए रहस्य मिलते जाएंगे। कोई नहीं जानता, पैदा होने से पहले हम कहां थे तथा मृत्यु के पश्चात कहां जाएंगे। हमें कल का पता नहीं है कि हमारे साथ क्या घटित होने वाला है।  समय, काल एवं परिस्थिति के साथ सब कुछ बदल जाता है। जो आज बहुत प्रिय है, हो सकता है कल प्रिय न रहे। प्रभु भक्ति ही एक ऐसा मार्ग है, जो जीवन के रहस्यों को आसानी से सुलझा देती है तथा इंसान के जीवन की नाव को पार लगा देती है।

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जब आत्मा का परमात्मा से जुड़ाव हो जाता है तब जीवन में कोई रहस्य नहीं बचता है। इंसान को सांसारिक सुख मिथ्या लगने लगते हैं और व्यक्ति इन सब चीजों से ऊपर उठकर एक अंतहीन आनंद की स्थिति में पहुंच जाता है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह-ये पांच चीजें इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन हैं।

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भक्ति इन पांचों शत्रुओं से बचाव करती है। ऐसी स्थिति में इंसान के लिए पूरा ब्रह्मांड अपना होता है, कोई पराया नहीं रहता। व्यक्ति का मन प्रेममय हो जाता है, वह सभी से प्रेम करने लगता है। ईश्वर की मर्जी के बिना तो इस ब्रह्मांड में पत्ता भी नहीं हिल सकता। प्रभु समय-समय पर अपनी शक्ति का अहसास भी कराते रहते हैं।

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भगवान श्रीकृष्ण अपने बाल्यकाल में जब अपने बाल-सखाओं के साथ दूर-दराज के जंगलों में खेलने चले जाते थे तब माता यशोदा उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती थीं। एक दिन बाल कृष्ण ने मां यशोदा को अपना मुंह खोलकर समस्त ब्रह्मांड दिखाया। तब वह समझ गईं कि यह कोई साधारण बालक नहीं। उसके बाद बाल कृष्ण की सुरक्षा को लेकर वह निश्चिंत हो गईं। भक्ति व्यक्ति के अंत:करण को शुद्ध रखती है।

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Niyati Bhandari

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