Hanuman Janam Katha : जानिए, कैसे हुआ हनुमान जी का अवतार और क्यों कहलाते हैं संकटमोचन

punjabkesari.in Thursday, Apr 02, 2026 - 12:27 PM (IST)

Hanuman jayanti 2026: पवन के समान शरीरधारी वायुपुत्र, समस्त संसार के जीवों के संकट हरने वाले, कल्याणमय, मंगलमूरति राम, लक्ष्मण एवं सीता सहित हे सुरभूप (देवताओं एवं पृथ्वी वासियों के  रक्षक, पालनहार), चिरंजीवी देवों के देव हनुमंत लाल जी अतुलित बल के स्वामी होते हुए भी कोमल हृदय हैं।

Hanuman Janam Katha

केवल स्मरण कराने पर पर्वताकार स्वरूप ले अपने बल एवं बुद्धि द्वारा असुरों का संहार कर देने वाले तथा ज्ञानियों में अग्र श्री रामदूत सेवक को अपने प्रभु के गोलोक गमन से पहले यही आज्ञा थी कि वह उनके उपरांत यहीं पृथ्वीलोक में विराज कर प्रभु भक्तों, धर्मानुरागी जीवों की रक्षा करेंगे।

तब से आज तक स्वामी भक्त, कर्तव्य पारायणी हनुमान जी निष्ठा से अपने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य कर उनके भक्तों की सेवा में सदैव तत्पर हैं।

Hanuman Janam Katha

वह वानर देश के राजा केसरी एवं अंजनी के पुत्र हैं। यद्यपि इनके प्राकट्य के बारे कई पौराणिक एवं आध्यात्मिक गाथाएं भी हैं। स्वयं राजा केसरी अति बलवान एवं बुद्धिमान थे। हाथियों के एक झुंड से ऋषियों की रक्षा करने पर प्रसन्न होकर आशीर्वादस्वरूप ऋषियों ने उनको यह आशीर्वाद दिया था कि ‘‘तुम्हारे ऐसा पुत्र पैदा होगा जो सहस्र हाथियों के समान बलशाली एवं अति विद्वान होगा।’’

भगवान विष्णु जब अपने आशीर्वाद को सत्य करने रामावतार होने को उद्यत हुए तब समस्त देवी-देवताओं को ब्रह्मा जी ने वानर रूप में भू-लोक गमन करने को कहा।

त्रिलोकी के नाथ भगवान शंकर भी प्रभु श्रीराम को अपना सर्वस्व मानते थे। वह भी जब देवताओं का साथ देने को हुए तो मैया पार्वती को यह अच्छा न लगा। अपने स्वामी को स्मरण कराया, ‘‘हे नाथ आपने तो रावण को उसके द्वारा अपने दस शीश सहर्ष काट कर आपको समर्पित करने पर आशीर्वाद स्वरूप उसे अजर, अमर रहने का वर दे रखा है। उस वचन का क्या होगा प्रभु?’’

पौराणिक गाथा के अनुसार तब भोले शंकर ने कहा, ‘‘देवी, मैं अपने इष्ट प्रभु राम की सेवा के लिए अपने ग्यारहवें अंश से हनुमान जी के रूप में अवतार लेकर अपने स्वामी की सेवा करूंगा।’’

तभी तो भगवान श्रीराम भी भगवान शंकर के प्रति अगाध श्रद्धा एवं प्रेम लिए कहते हैं : शिव द्रोही मम दास कहावा, सो नर मोहि सपनेहु नहि पावा।

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एक बार राजा केसरी की पत्नी अंजनी जब शृंगारयुक्त वन में विहार कर रही थीं, तब पवन देव ने उनका स्पर्श किया। जैसे ही माता कुपित होकर शाप देने को उद्यत हुईं तो वायुदेव ने अति विनम्रता से निवेदन किया, ‘‘मां, शिव आज्ञा से मैंने ऐसा दु:साहस किया परन्तु मेरे इस स्पर्श से आपको पवन के समान द्रुत गति वाला एवं महापराक्रमी तेजवान पुत्र होगा।’’

इसी पवन वेग जैसी शक्ति युक्त होने से सूर्य के साथ उनके रथ के समानांतर चलते-चलते अनन्य विद्याओं एवं ज्ञान की प्राप्ति करके अंजनी पुत्र पवन पुत्र हनुमान कहलाए। इंद्र द्वारा वज्र के प्रहार से इनकी हनु टेढ़ी हो गई, मूर्छित अवस्था में जब इन्हें ब्रह्मा जी के पास लाया गया तो समस्त देवताओं ने क्षमायाचना करते हुए आशीर्वाद स्वरूप इन्हें अपनी दिव्य शक्तियां प्रदान कीं।  

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भगवान सूर्य नारायण ने भी अपने तेज का सौवां हिस्सा इन्हें आशीर्वाद स्वरूप दिया। ऐसे बलशाली पराक्रमी तेजस्वी देवता को अभिमान लेशमात्र भी छू नहीं पाया। तुलसीकृत श्री रामायण में इनका स्थान-चरित्र सबसे ऊंचा है इसीलिए अपनी नि:स्वार्थ सेवा निष्ठा के कारण अपने स्वामी प्रभु राम की निकटतम निकटता इन्हीं को प्राप्त हुई।

जो जन इनकी नित्य श्रद्धा निष्ठा से पूजा-अर्चना, श्री हनुमान चालीसा का नित्य पाठ अथवा इनके स्वामी के प्रति इन्हीं की तरह के श्रद्धा भाव रखता है, ऐसे जीव पर सरल-सहज हनुमान जी कृपा करके उसके संकट दूर करते हैं और संकटमोचन कहलाते हैं।

मंगलवार को जन्मे हनुमान जी मंगल ही मंगल करने वाले हैं। वैसे तो सभी दिन ईश्वर द्वारा रचित एक समान हैं मगर मंगलवार के दिन जो जन हनुमान जी को लाल सिंदूर, बेसन के लड्डू, लाल लंगोट अर्पित कर चालीसा पाठ करके इनकी आराधना करता है, उसका कभी अमंगल नहीं होता।

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Content Writer

Niyati Bhandari

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