दशहरे पर देवी अपराजिता की पूजा की ये है सही विधि, आप भी जानें

2020-10-25T12:35:09.807

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
अपनी वेबसाइट के माध्यम से हम आपको इससे पहले भी कई बार बता चुके हैं कि अपराजिता फूल का महत्व न केवल वास्तु शास्त्र में है बल्कि धार्मिक शास्त्र में है। इसी कड़ी मे आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि दशहरा के दिन मां अपराजिता के पूजन का क्या महत्व है। जी हां, इससे पहले हमने आपको अपराजिता फूल की बहुत जानकारी दी है। आज हम बताने जा रहे हैं कि दशहरा व विजयादशमी के पर्व पर अपराजिता पूजा कैसे की जाती है। तो चलिए बिल्कुल भी देर न करते हुए आपको बताते हैं कि इस पूजन के बारे में- 
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धार्मिक शास्त्रों के अनुसार अपराजिता पूजा विजया के प्रतीक का पर्व विजयादशमी का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक दशहरे के दिन की जाने वाली ये पूजा अपराह्न काल में की जाती है। बताया जाता है इस पूजा को करने के लिए घर से पूर्वोत्तर की दिशा में कोई पवित्र और शुभ स्थान को चिन्हित करें। बता दें यह स्थान किसी मंदिर, गार्डन आदि के आस-पास भी हो सकता है। 

आइए जानें कैसे करना चाहिए इस दौरान पूजन-
सबसे पहले पूजन स्थल को स्वच्छ करें और चंदन के लेप के साथ अष्टदल चक्र यानि (08 कमल की पंखुड़ियां) बनाएं।
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इसके बाद पुष्प और अक्षत के साथ देवी अपराजिता की पूजा के लिए संकल्प लें। इसके बाद अष्टदल चक्र के मध्य में 'अपराजिता नमः' मंत्र के साथ देवी अपराजिता की प्रार्थना करें। इसके अलावा मां जया को दाईं और क्रियाशक्तयै नमः मंत्र के साथ आवाह्नन करें तथा बाईं ओर मां विजया की 'उमायै नम:' मंत्र के साथ पूजा करें।

इसके अतिरिक्ति 'अपराजिताय नम':, 'जयायै नम:' और 'विजयायै नम:' मंत्रों के साथ शोडषोपचार पूजा भी करें।

फिर प्रार्थना करें-
और आखिर में निम्न मंत्र के साथ पूजा का विसर्जन कर दें। 

मंत्र- 'हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम।'
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Jyoti

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