Durva Ashtami Special: भगवान विष्णु के रोम से सीता माता के तिनके तक, जानिए क्यों इतनी पवित्र और अमर है दूर्वा घास? पढ़ें रहस्यमयी पौराणिक कथाएं
punjabkesari.in Thursday, Sep 17, 2026 - 02:24 PM (IST)
Durva Ashtami 2026: हिंदू धर्म में भगवान श्री गणेश का पूजन हो या कोई भी मांगलिक कार्य, दूर्वा (दूब घास) के बिना हर पूजा अधूरी मानी जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन पर उगने वाली यह छोटी सी घास इतनी पवित्र और अमर कैसे बनी? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दूर्वा की उत्पत्ति का सीधा संबंध भगवान विष्णु के कूर्म अवतार, समुद्र मंथन के अमृत और भगवान गणेश द्वारा अनलासुर दैत्य के वध से जुड़ा है। इतना ही नहीं, रामायण काल में भी दूर्वा ने नारी के सम्मान की रक्षा में अहम भूमिका निभाई थी। आइए जानते हैं दूर्वा अष्टमी के इस पावन अवसर पर दूर्वा घास से जुड़े ये अद्भुत और अनसुने पौराणिक रहस्य।

Story of Durva Ashtami दूर्वा अष्टमी की पौराणिक कथा- कथाओं के अनुसार भगवान विष्णु ने जब कूर्म अवतार धारण किया था, तब वे मन्दराचल पर्वत की धुरी में विराजमान हो गए थे। पर्वत के तेज गति से घूमने के कारण भगवान विष्णु के शरीर से कुछ रोम निकलकर समुद्र में गिर गए। ये रोम पृथ्वीलोक पर दूर्वा घास के रूप में उत्पन्न हो गए। इस वजह से दूर्वा को इतना शुद्ध माना जाता है।
इसके अलावा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक और कथा सामने आती है कि समुद्र मंथन के बाद जब असुर और देवता अमृत लेकर जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूंदें घास पर गिर गई और तब से ये अमर हो गई।
दूर्वा दो शब्दों के जोड़ से बना है दुह और अवम। दुह का अर्थ है परम अध्यात्मिक और अवम का अर्थ है कण। दूर्वा का कण तीन भागों में विभाजित होता है। जिन्हें भगवान गणेश, महाशक्ति और भगवान शंकर का प्रतीक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार दूर्वा घास गणेश जी का आशीर्वाद ग्रहण करने की क्षमता रखता है। इस कारण इसकी कोमलता व शुद्धता के रुप को भगवान के आगे अर्पित करने से मन की इच्छाएं बहुत जल्दी पूरी होती हैं।

दूर्वा घास की शीतलता व महत्वता का प्रमाण पौराणिक काल की भगवान गणेश व अनलासुर नाम के राक्षस के भीषण युद्ध कथा से मिलता है। जब गणेश जी ने देवताओं की रक्षा के लिए विराट रुप धारण कर अनलासुर नामक दैत्य के द्वारा फेंके गए अग्नि के गोलों को निगल लिया था। उसे उत्पन्न हुई अग्नि का ताप भगवान गणेश को पीड़ा देने लगा। तब इस पर चन्द्र देव ने भगवान गणेश के मस्तक पर अपनी शीतलता देकर उसे शांत करने का प्रयास किया। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने अपने कमल की पंखुड़ियों के द्वारा इस आग्नि को शांत करने का प्रयास किया। भगवान शिव ने अपने गले का सर्प शीतलता देने के लिए गणेश जी के उदर पर लपेट दिया परंतु कोई भी प्रयास अग्नि को शांत न कर पाया। इसके बाद कुछ ऋषियों ने दुर्वा घास का 1 कण भगवान गणेश को दिया। जिसके तुरंत बाद उनके उदर की गर्मी शांत हो गई। इसके बाद दुर्वा घास को पवित्रता का दर्जा प्राप्त हुआ।

अन्य मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के हाथ से गिरे केश अथवा रोम से दूर्वा की उत्पति हुई थी। इसके बाद समुद्र मंथन के अमृत की कुछ बूंदे दूर्वा घास पर गिर जाने से ये और भी पवित्र और अमर मानी जाती है।

रामायण में दूर्वा का विशेष महत्व बताया गया है। ये स्त्री के सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है क्योंकि जब रावण सीता माता का हरण कर उन्हें जबरन लंका ले गया था। वहां उनका शील हरण करने की चेष्टा कर रहा था, उस समय दूर्वा के छोटे से तिनके ने उनके शील की रक्षा करी थी।
