Durga Visarjan 2026 Date Muhurat: 20 अक्तूबर को बन रहा है विशेष संयोग, विजयादशमी पर इस शुभ समय में ही करें मां दुर्गा की विदाई
punjabkesari.in Monday, Oct 19, 2026 - 03:56 PM (IST)
Durga Visarjan 2026 Date and Muhurat: शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां शक्ति की भक्ति और आराधना में लीन रहने के बाद, विजयादशमी (दशहरा) के दिन माता रानी को अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के समापन पर मां दुर्गा अपने लोक पुनः लौट जाती हैं।
वर्ष 2026 में दुर्गा विसर्जन का पर्व 20 अक्तूबर को पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। आइए जानते हैं इस वर्ष दुर्गा विसर्जन का सटीक शुभ मुहूर्त, सरल पूजन विधि और वे अचूक मंत्र, जिनसे मां जगदंबा का आशीर्वाद सदा आपके परिवार पर बना रहेगा।

दुर्गा विसर्जन 2026 की सही तारीख और तिथि (Visarjan Date & Tithi)
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार, दुर्गा विसर्जन आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजयादशमी के दिन किया जाता है।
दशमी तिथि का प्रारंभ: 20 अक्तूबर 2026 को दोपहर 12:20 बजे से।
दशमी तिथि का समापन: 21 अक्तूबर 2026 को दोपहर 2:11 बजे तक।
उदया तिथि और परंपरा के अनुसार विसर्जन: 20 अक्तूबर 2026, मंगलवार।
Durga Visarjan Muhurat दुर्गा विसर्जन 2026 का शुभ मुहूर्त
शास्त्रों में विसर्जन पूजा के लिए निश्चित समय का विशेष महत्व बताया गया है। 20 अक्तूबर को प्रतिमा विसर्जन के लिए निम्नलिखित समय सबसे उत्तम रहेगा:
विसर्जन का शुभ समय: दोपहर 12:50 बजे से दोपहर 2:49 बजे तक
कुल समय सीमा: 1 घंटा 59 मिनट
(ध्यान दें: अलग-अलग स्थानों पर स्थानीय सूर्योदय और क्षेत्रीय पंचांग की गणना के आधार पर समय में आंशिक अंतर हो सकता है।)
Durga Visarjan katha : दुर्गा पूजा आज विश्व प्रसिद्ध है, यह तो सभी जानते हैं लेकिन इस उत्सव की शुरुआत कब हुई, इस बारे में बहुत कम लोगों को ही ज्ञात है। अविभाजित बंगाल में दुर्गा पूजा की शुरुआत 16वीं शताब्दी के अंत में वर्ष 1576 में हुई थी। जहां पूजा हुई वह वर्तमान में बांग्लादेश है। बांग्लादेश के ताहिरपुर में एक राजा कंस नारायण हुआ करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम अपने गांव में देवी दुर्गा की पूजा की शुरुआत की थी।
इसके बाद कोलकाता में दुर्गा पूजा पहली बार 1610 में बड़िशा (बेहला साखेर का बाजार क्षेत्र) के राय चौधरी परिवार ने आयोजित की थी। तब कोलकाता शहर नहीं एक गांव था, जिसका नाम था कोलिकाता। इसके कुछ वर्ष बाद कोलकाता के उस इलाके में देवी दुर्गा की आराधना व पूजा की गई, जिसे आज शोभा बाजार के नाम से जाना जाता है। इतिहासविदों का मत है कि कोलकाता के शोभा बाजार राजबाड़ी में सबसे पहले आश्विन शुक्ल पक्ष को नवरात्रि पर दुर्गा पूजा आयोजित की गई। इसके बाद बांकुड़ा जिले के विष्णुपुर के प्रसिद्ध राज परिवार की दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। तब से साल-दर-साल दुर्गा पूजा आयोजकों की संख्या में वृद्धि होती गई।
कालक्रम में दुर्गा पूजा की भव्यता बढ़ती गई, जिसका परिणाम है कि बीते वर्ष यूनेस्को द्वारा बंगाल की दुर्गा पूजा को विश्व विरासत का दर्जा दिया गया। इतिहासविदों के अनुसार राजा कंस नारायण ने अपनी प्रजा की समृद्धि और अपने राज्य विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ के बारे में सोचा और इस बात की चर्चा अपने कुल पुरोहितों से की। कहा जाता है कि अश्वमेध यज्ञ की बात सुनकर राजा कंस नारायण के पुरोहितों ने कहा कि अश्वमेध यज्ञ कलियुग में नहीं किया जा सकता। इसे भगवान राम ने सतयुग में किया था। कलियुग में अश्वमेध यज्ञ की जगह दुर्गा पूजा की जा सकती है। तब पुरोहितों ने उन्हें दुर्गा पूजा की महिमा के बारे में बताया।
पुरोहितों ने बताया कि कलियुग में शक्ति की देवी महिषासुर मर्दिनी मां दुर्गा की पूजा करें। जो सभी को सुख-समृद्धि, ज्ञान और शक्ति प्रदान करती हैं। इसके बाद राजा ने धूमधाम से मां दुर्गा की पूजा की। तब से आज तक बंगाल में दुर्गा पूजा का सिलसिला चल पड़ा। नवरात्रि महा षष्ठी के दिन मां दुर्गा का बोध होता है। इसमें मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है। महासप्तमी के दिन नवपत्रिका पूजा होती है। इस नवपत्रिका पूजा में धान, हल्दी का पेड़, जयंती, अशोक, अनार की डाली, बेल की डाली आदि को केले के पेड़ के साथ बांधकर पूजा की जा जाती है। उसके बाद गंगा में स्नान करवाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि नवपत्रिका पूजा मां दुर्गा के 9 रूपों की प्रकृति की शक्ति स्वरूपा पूजा है। उसके बाद महाअष्टमी व महानवमी की पूजा होती है। दशमी के दिन पारम्परिक रूप में माता दुर्गा का विसर्जन होता है।

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