दशलक्षण पर्व का शुभारंभ, जानें 10 धर्मों में छिपे सुखी और संतुलित जीवन के राज
punjabkesari.in Wednesday, Sep 16, 2026 - 09:18 AM (IST)
Dashlakshan Parva 2026 : दशलक्षण पर्व बुधवार से शुरू हो रहा है और यह पर सिर्फ जैन धर्म के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि पूरे समाज के लिए इसके संदेश हैं। दरअसल पर्युषण शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है आत्मा के समीप वास करना अथवा कर्मों का क्षय करना। इस दौरान दस उत्तम धर्मों- दशलक्षण पर विशेष चिंतन किया जाता है। यह दस दिवसीय महापर्व आत्मशुद्धि, तपस्या और आध्यात्मिक जागृति का अनूठा अवसर है। जैन आचार्यों के अनुसार, यह पर्व केवल उपवास या बाह्य अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आंतरिक परिवर्तन और आत्म-निरीक्षण का समय है। दशलक्षण पर्व के दस धर्म- उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य और उत्तम ब्रह्मचर्य मानव जीवन को नैतिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से श्रेष्ठ बनाने की दिशा दिखाते हैं।
प्रत्येक धर्म मनुष्य के भीतर उपस्थित किसी न किसी विकार को दूर करने का संदेश देता है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, कपट के स्थान पर सरलता, लोभ के स्थान पर संतोष और असंयम के स्थान पर आत्मनियंत्रण अपनाने का संदेश इस पर्व की मूल भावना है। पर्युषण पर्व के दौरान जैन श्रद्धालु अपनी क्षमता और संकल्प के अनुसार एकासन, उपवास, बेला और अन्य प्रकार की तप साधना करते हैं। अनेक श्रद्धालु दस दिनों तक निराहार रहकर भी तपस्या करते हैं। यही तपस्या हमें पूरे समाज से जोड़ती है और हम सब इसी दिशा में काम करते हैं। जीवन में संतुलन और साथ ही समाज के कमजोर वर्ग की सहायता हमें मन से आती है और यह बातें पूरे समाज को जोड़ती हैं।
इस दौरान समाज के लिए बनी सकारात्मक सोच हमें बहुत आगे ले जा सकती है। जैन धर्म में क्षमता एक बहुत बड़ा तत्व है और इस तत्व को अगर पूरा समाज सीख ले तो बहुत बड़ा परिवर्तन हो सकता है। क्षमा की भावना मानसिक तनाव और क्रोध को कम करने में सहायक हो सकती है। क्षमा की भावना व्यक्ति को मानसिक शांति, सहनशीलता और सकारात्मक भावनाओं की ओर ले जाती है। यदि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर मन में द्वेष बनाए रखता है तो उसका मानसिक बोझ बढ़ता जाता है। इसके विपरीत क्षमा का अभ्यास मन को तनावमुक्त करने और सामाजिक संबंधों में सौहार्द बढ़ाने में सहायक हो सकता है। पर्युषण पर्व इसलिए केवल जैन समाज का धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता को आत्मचिंतन, क्षमा, संयम, सत्य सिखाता है।
