Chanakya Niti : क्यों विद्वानों की छोटी कमियां नहीं देखनी चाहिए ?

punjabkesari.in Saturday, Jan 10, 2026 - 02:07 PM (IST)

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ

Chanakya Niti : चाणक्य नीति और भारतीय दर्शन के अनुसार, संसार में पूर्णता एक ऐसा शिखर है जिसे छूना अत्यंत कठिन है। आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में मनुष्य के स्वभाव और सामाजिक व्यवहार का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। उनके दो प्रमुख सूत्र विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः और नास्ति रत्नमखंडितम्ह में यह सिखाते हैं कि महानता को दोषों की कसौटी पर नहीं, बल्कि गुणों के आधार पर मापा जाना चाहिए।

मानवीय स्वभाव और दोषों की सुलभता
"विपश्चित्स्वपि सुलभा दोषाः का शाब्दिक अर्थ है कि विद्वानों और ज्ञानियों में भी दोष मिलना सहज है। चाणक्य का मानना था कि जब तक मनुष्य शरीर धारण किए हुए है, वह प्रकृति के तीन गुणों के अधीन रहता है। पूर्ण ज्ञानी होने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति के भीतर की मानवीय संवेदनाएं या त्रुटियां समाप्त हो गई हैं।

Chanakya Niti

समाज अक्सर किसी विद्वान, आध्यात्मिक गुरु या नेतृत्वकर्ता से यह अपेक्षा करता है कि वे हर कदम पर त्रुटिहीन होंगे। लेकिन यह अपेक्षा अवास्तविक है। यदि हम किसी महान व्यक्ति की छोटी-सी भूल को पकड़कर बैठ जाते हैं, तो हम उनके उस विशाल ज्ञान और अनुभव से वंचित रह जाते हैं जो वे समाज को दे सकते हैं। दोष तो सूर्य में भी है लेकिन क्या उस एक दोष के कारण हम सूर्य के प्रकाश का त्याग कर सकते हैं ?

रत्न का उदाहरण:
चाणक्य ने बहुत सुंदर उपमा दी है रत्न की। वे कहते हैं, नास्ति रत्नमखंडितम्" अर्थात् ऐसा कोई भी रत्न नहीं है जो पूरी तरह से अखंड या दोषरहित हो। प्रकृति से मिलने वाले कीमती पत्थरों में अक्सर कोई न कोई सूक्ष्म रेशा, रंदा या इंक्लूजन होता है।

बावजूद इसके, उस रत्न की कीमत उसकी चमक, उसकी दुर्लभता और उसके प्रभाव से आंकी जाती है, न कि उस मामूली से प्राकृतिक दोष से। यदि जौहरी केवल दोष को देखे, तो उसे कभी कोई कीमती रत्न मिल ही नहीं पाएगा। इसी प्रकार, समाज के गुणीजन मानवीय रत्न हैं। उनमें यदि कोई साधारण दोष है तो उसे उस व्यक्ति की विद्वत्ता के सामने गौण माना जाना चाहिए।

Chanakya Niti

क्यों नहीं देखनी चाहिए छोटी कमियां ?

विद्वानों की छोटी कमियों की अनदेखी करने के पीछे कई व्यावहारिक कारण हैं:

यदि हम केवल बुराइयों को खोजेंगे, तो समाज में कोई भी आदर्श व्यक्ति नहीं बचेगा। गुणों का सम्मान करने से ही समाज में सकारात्मकता बढ़ती है।

भारतीय संस्कृति में नीर-क्षीर विवेक की बात कही गई है। जिस प्रकार हंस पानी को छोड़कर दूध ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को दूसरे के दोषों को छोड़कर केवल उनके गुणों को ग्रहण करना चाहिए।

जब हम दूसरों के दोषों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क नकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। इसके विपरीत, दूसरों के गुणों को देखने से हमारे भीतर भी उन गुणों के प्रति श्रद्धा जागती है और हमारा स्वयं का व्यक्तित्व निखरता है।

Chanakya Niti


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Prachi Sharma

Related News