Chanakya Niti : इन जगहों पर लगाया धन नहीं जाता व्यर्थ, बढ़ती है तरक्की
punjabkesari.in Monday, Feb 23, 2026 - 11:31 AM (IST)
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
Chanakya Niti : आचार्य चाणक्य, जिन्हें भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र का पितामह माना जाता है, ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक चाणक्य नीति में जीवन के हर पहलू पर प्रकाश डाला है। चाणक्य के अनुसार, धन केवल संचय करने के लिए नहीं होता, बल्कि उसका सही उपयोग और सही स्थान पर दान करना ही व्यक्ति की असली सफलता और बरकत का कारण बनता है। चाणक्य नीति कहती है कि गलत जगह दिया गया दान व्यर्थ जाता है लेकिन कुछ विशेष स्थान ऐसे हैं जहाँ धन देने से न केवल पुण्य मिलता है, बल्कि देने वाले के मान-सम्मान और आर्थिक लाभ में भी कई गुना वृद्धि होती है।
बीमार और असहाय व्यक्ति की सहायता
चाणक्य के अनुसार, किसी बीमार या शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्ति की मदद करना सबसे बड़ा पुण्य है। यदि कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी के इलाज, दवाओं या भोजन की व्यवस्था के लिए धन खर्च करता है, तो उसे ईश्वर की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जब आप किसी का जीवन बचाने में सहयोग करते हैं, तो उस परिवार की दुआएं आपके जीवन से नकारात्मकता को खत्म करती हैं। चाणक्य मानते थे कि परोपकाराय पुण्याय, अर्थात परोपकार से पुण्य मिलता है और पुण्य से भाग्य उदय होता है, जो अंततः धन के नए मार्ग खोलता है।

धर्म और सामाजिक कार्यों में योगदान
समाज के कल्याण के लिए बनाए गए संस्थान, जैसे मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ या अस्पताल के निर्माण में दिया गया धन कभी कम नहीं होता। चाणक्य के अनुसार, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना व्यक्ति के कुल की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। समाज सेवा में धन लगाने वाले व्यक्ति को समाज में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त होता है। लोग उसे एक मार्गदर्शक और रक्षक के रूप में देखते हैं। धार्मिक स्थलों पर दान करने से व्यक्ति के मानसिक तनाव में कमी आती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे वह अपने व्यवसाय या कार्यक्षेत्र में बेहतर निर्णय ले पाता है।
सुयोग्य पात्र और शिक्षा के क्षेत्र में दान
विद्या दान को महादान माना गया है। चाणक्य, जो स्वयं एक महान शिक्षक थे, का मानना था कि किसी गरीब लेकिन प्रतिभाशाली विद्यार्थी की शिक्षा के लिए धन देना राष्ट्र निर्माण में निवेश करने जैसा है। शिक्षा के लिए दिया गया धन समाज से अंधकार मिटाता है। जब वह शिक्षित बच्चा सफल होता है, तो उसका श्रेय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दान देने वाले को भी मिलता है। शिक्षित समाज में व्यापार और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, जिसका लाभ अंततः पूरे समाज और दानकर्ता को भी मिलता है।
आपदा और संकट के समय मदद
जब कोई देश या समाज किसी प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा हो, तब मुक्त हस्त से दान करना श्रेष्ठ माना गया है। चाणक्य के अनुसार, संकट के समय जो अपनी संपत्ति का एक हिस्सा दूसरों को बचाने में लगाता है, उसकी रक्षा स्वयं काल करता है। यह एक कर्म प्रधान सिद्धांत है जो बोओगे, वही काटोगे। आज आप किसी के संकट में साथी बनेंगे, तो भविष्य में आपके ऊपर आने वाले संकट स्वतः ही टल जाएंगे। आपदा के समय दान करने से धन का शुद्धिकरण होता है, जिससे घर में बरकत बनी रहती है।

धन खर्च करने के चाणक्य के अन्य नियम
आय का एक निश्चित हिस्सा दान करें
चाणक्य के अनुसार, व्यक्ति को अपनी आय का कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा परोपकार और धार्मिक कार्यों के लिए अलग रखना चाहिए। यह 'दशांश' दान व्यक्ति की शेष 90 प्रतिशत आय को शुद्ध और सुरक्षित बनाता है।
पात्र की पहचान
दान हमेशा पात्र को ही देना चाहिए। चाणक्य नीति के अनुसार, यदि आप किसी आलसी या अधर्मी व्यक्ति को धन देते हैं, तो वह उसका दुरुपयोग करेगा, जिसका पाप आपको भी लगेगा। इसलिए दान देने से पहले स्थान और व्यक्ति की जांच अवश्य करें।
