Bhishma Dwadashi 2022: आज अपने पितरों को करें प्रसन्न, पाएं मनचाहा वर
punjabkesari.in Sunday, Feb 13, 2022 - 09:23 AM (IST)
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Bhishma Dwadashi 2022- हर साल माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को भीष्म द्वादशी के रुप में मनाया जाता है। कालांतर से ही इस दिन पितृ भक्त भीष्म पितामह की पूजा होती आ रही है। हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भीष्माष्टमी तथा इससे ठीक 4 दिन बाद भीष्म द्वादशी का पर्व मनाया जाता है। कुछ लोग इसे गोविंद द्वादशी के नाम से भी जानते हैं। आज 13 फरवरी दिन रविवार को भीष्म द्वादशी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा किए जाने का विधान है।

Bhishma Dwadashi Puja Vidhi- सभी कामों से निवृत होकर स्नान के पश्चात भगवान लक्ष्मीनारायण की केले के पत्ते, फल, पंचामृत, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम और दूर्वा आदि से पूजा करें। पहले दूध, शहद, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता और मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार करें और फिर भगवान को इसका भोग लगाएं।
पूजन के बाद भीष्म द्वादशी की कथा सुनें। फिर देवी लक्ष्मी सहित अन्य देवी-देवताओं का सिमरन करें। पहले ब्राह्मण को भोजन कराएं व उन्हें सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दें। अब परिवार सहित मिलकर खाना खाएं।

Bhishma Dwadashi katha: महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार गंगा पुत्र देवव्रत को अपने पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। युद्ध के दौरान अर्जुन ने भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या पर लेटा दिया था। उस वक्त सूर्य दक्षिणायन चल रहा था। पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतिक्षा करने लगे। फिर उन्होंने माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अपने प्राणों का त्याग किया। द्वादशी तिथि पर भीष्म पितामह के निमित्त तर्पण और पूजा करने की परंपरा का आरंभ हुआ। द्वादशी के दिन पिंड दान, पितृ तर्पण, तर्पण, ब्राह्मण भोज तथा दान-पुण्य करना अन्य दिनों से अधिक फलदायी होता है।
इस रोज़ व्रत करने वाले भक्तों के सभी कार्य सफल होते हैं। जो व्यक्ति इस व्रत को पूरी श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करता है, भगवान उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। लोगों का तो यहां तक विश्वास है कि अगर कोई नि:संतान इस व्रत को श्रद्धा भाव से करता है तो उसको अवश्य संतान प्राप्ति होती है। इस दिन नदियों में स्नान-दान करने की भी परंपरा है। माना जाता है कि द्वादशी तिथि को भीष्म पितामह का पूजन करने से पितृ प्रसन्न होकर सुख और सौभाग्य का वरदान देते हैं।

