पेगासस जासूसी कांड की हमें विशेष चिंता क्यों करनी चाहिए

2021-07-21T06:07:24.447

सवाल है कि पेगासस नामक उडऩ घोड़ा देश को कहां लेकर जाएगा? ग्रीक मिथक के अनुसार पेगासस पंखों वाला एक सफेद घोड़ा है जो पलक झपकते ही यहां से वहां पहुंच सकता है। 21वीं सदी में पेगासस उस जासूसी के सॉफ्टवेयर का नाम है जो पलक झपकते ही हर सूचना को यहां से वहां पहुंचा सकता है। आज इसी पेगासस के चलते देश और दुनिया में हंगामा है। 

हंगामा यूं है कि इस इसराईली सॉफ्टवेयर के जरिए दुनिया भर में जिन लोगों की जासूसी हो रही थी उनके नाम मीडिया के हाथ लग गए हैं। हंगामा इस बात का है कि हमारे यहां इस सूची में नामी-गिरामी पत्रकार, विपक्षी नेता आंदोलनजीवी और संवैधानिक पदों पर बैठे लोग शामिल हैं। हंगामा इस बात पर है कि इस तरह की जासूसी क्या संविधान, कानून और मर्यादा के अनुरूप है? हालांकि सरकार ने अभी तक यह कबूला नहीं है, फिर भी स्पष्ट है कि पेगासस के जरिए जासूसी का यह काम सरकार या उसकी कोई एजैंसी ही करवा रही थी।

यह सॉफ्टवेयर दुनिया में सिर्फ एक इसराईली कंपनी एन.एस.ओ. के पास है। उस कंपनी की यह घोषित नीति है कि वह इस सॉ टवेयर का इस्तेमाल किसी निजी व्यक्ति या समूह को करने नहीं देती। इसके ग्राहक सिर्फ सरकार या सरकार द्वारा अनुमोदित कोई एजैंसी ही हो सकती है। यानी कि भारत में इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल भारत सरकार के आदेश और इसराईल सरकार की स्वीकृति के बिना संभव नहीं था। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी जासूसी गैरकानूनी है। जाहिर है जिन लोगों की जासूसी हुई है उनका राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। इसके अलावा और किसी कारण से जासूसी नहीं करवाई जा सकती। 

जब यह सवाल पहली बार 2019 में उठा, तब तत्कालीन सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गोलमोल सा जवाब दिया था। वही जवाब वर्तमान मंत्री ने दोहरा दिया है। सरकार ने पेगासस सॉफ्टवेयर खरीदा या नहीं, इस पर सरकारी प्रवक्ता चुप है। बस इतना कहते हैं कि कुछ भी अनधिकृत काम नहीं हुआ है। इसका मतलब यह निकाला जा सकता है कि हां, हमने पेगासस खरीदा और जासूसी करवाई लेकिन कागज पर अनुमति दर्ज करके। यह अनुमति किसने और कब दी, इस पर भी सरकार चुप है। मतलब कि दाल में काला है। 

हर कोई जानता है कि सरकार विदेशों ही नहीं, देश में भी जासूसी करवाती है, सिर्फ विदेशी या आपराधिक तत्वों पर ही नहीं, अपने राजनीतिक विरोधियों के बारे में भी सूचना इक_ी करवाती है। इंदिरा गांधी के समय से इंटैलीजैंस ब्यूरो और रॉ इन कामों के लिए बदनाम रही हैं। अशोक गहलोत ने सरकारी जासूसों का इस्तेमाल सचिन पायलट पर निगाह रखने के लिए किया था। गुजरात के मु यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह का नाम भी जासूसी कांड में आया था। यह सब गैरकानूनी है, लेकिन ऐसा होता आया है। तो फिर पेगासस जासूसी कांड में ऐसा क्या खास है, जिस पर हमें विशेष चिंता करनी चाहिए? 

एक तो इसलिए कि पेगासस की जासूसी कोई सामान्य किस्म की नहीं है। इस सॉ टवेयर के जरिए सरकार सिर्फ आपके फोन कॉल ही नहीं सुन सकती, बल्कि आपके फोन पर रखी तमाम सामग्री देख और रिकॉर्ड कर सकती है। सामान्य कॉल ही नहीं, व्हाट्सएप और सिग्नल के कॉल भी सुन सकती है, आपकी कांटैक्ट लिस्ट आपके फोटो और वीडियो रिकॉर्ड कर सकती है। मतलब आपके सार्वजनिक और निजी जीवन की पल-पल की जानकारी यह सॉ टवेयर रख सकता है। 

विशेष चिंता की दूसरी बात यह है कि इस जासूसी के घेरे में अब एक बहुत बड़ा दायरा आ गया है। अब तक जो नाम सामने आए हैं उनमें 40 से अधिक पत्रकार हैं, अधिकांश वे लोग जो सरकार के गलत कामों पर पैनी निगाह रखते हैं। इस सूची में पूर्व चुनाव आयुक्त लवासा का नाम है जो पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की मर्यादा उल्लंघन पर सवाल उठा रहे थे। और तो और, इस सूची में सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश का नाम है और उस महिला के परिवार के 11 लोगों का भी, जिसने जस्टिस गोगोई पर यौन प्रताडऩा के आरोप लगाए थे। 

विडंबना यह है कि जब नए उद्योग एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव इस मामले में लीपापोती कर रहे थे, उसी वक्त यह रहस्योद्घाटन भी हुआ कि खुद उनका फोन भी जासूसी का शिकार होने वाली लिस्ट में था। तीसरी और सबसे बड़ी ङ्क्षचता यह होनी चाहिए कि इस जासूसी में एक विदेशी प्राइवेट कंपनी के हाथ सारी गोपनीय सामग्री लग सकती है। बस आप इसराईली कंपनी को वह फोन नंबर दे दीजिए जिसकी निगरानी करवानी है, फिर वह खुद उसकी जासूसी कर सारी सामग्री आपको सौंप देगी। इसके बदले में एन.एस.ओ. कंपनी हर फोन के लिए लगभग एक करोड़ रुपए की मोटी फीस वसूलती है। 

अगर भारत के लगभग 3,000 फोनों की निगरानी की खबर सही है तो इसका मतलब होगा कि सत्ताधारी पार्टी और नेता द्वारा अपने राजनीतिक खेल के लिए पब्लिक की जेब से 3,000 करोड़ रुपए से अधिक का खर्चा होगा। पैसे की बात छोड़ भी दें तो भी इसका मतलब होगा देश की इतनी गोपनीय सूचना को विदेशियों के हवाले कर देना।

सवाल है कि अब इस हवाई घोड़े की सवारी कौन करेगा? अगर देश को इसकी सवारी करनी है तो एक ही रास्ता है- सरकार ईमानदारी से बताए कि पेगासस  की खरीद किसने और कैसे की? किन लोगों की जासूसी हुई और किस आधार पर? आगे से जनता के पैसे से सत्ताधारी अपने विरोधियों की जासूसी न करवा सकें, इसकी स्पष्ट व्यवस्था हो। लेकिन अगर सत्ताधारी इस घोड़े पर सवार रहने की जिद करेंगे तो उनके साथ वही होगा, जो ग्रीक मिथक के हिसाब से पेगासस पर सवार होने वाले बेलोरोफोन के साथ हुआ था, जो माऊंट ओलंपस पर चढ़ाई करते वक्त पेगासस से गिर गया था। वो पेगासस पर फिर कभी नहीं चढ़ पाया।-योगेन्द्र यादव
 


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Content Writer

Pardeep

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