उद्धव के सामने खुद को और पार्टी को बचाने की बड़ी चुनौती

punjabkesari.in Tuesday, Jun 28, 2022 - 03:49 AM (IST)

महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक संकट क्या शिवसेना के भीतर एक वैचारिक लड़ाई है या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की अपने सॉफ्ट हिन्दुत्व के बारे में अपने सैनिकों को समझा पाने की अक्षमता? अथवा क्या यह भाजपा की सभी गैर भाजपा सरकारों को खत्म करने की महत्वाकांक्षा है, या यह राजनीतिक ताकतों को पुन:संगठित करने के लिए है? संभवत: यह इन सभी का मिश्रण है। 

जब 2019 में उद्धव ने महा विकास अघाड़ी (एम.वी.ए.) गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया तो इस बारे में संदेह व्यक्त किए जा रहे थे कि उनकी सरकार कितने समय के लिए चलेगी। ऐसा गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों की विषमताओं के कारण था। ऐसा सोचने वालों की भविष्यवाणियों के अनुरूप इन गत 3 वर्षों के दौरान उद्धव एक के बाद एक संकट का सामना करते आ रहे हैं। अब पानी सिर के ऊपर से निकल चुका है। तेजी से बदलते घटनाक्रम में पार्टी को एक स्पष्ट विभाजन का सामना करना पड़ रहा है यदि राजनीतिक दलों में कोई नया तालमेल नहीं बनता अथवा 2 परस्पर विरोधी धड़े एक साथ नहीं आ जाते। एम.वी.ए. गठबंधन सरकार के धराशायी होने का भी खतरा है। 

21 जून की सुबह उद्धव को अपनी पार्टी के भीतर पनपते विद्रोह के बारे में सुनने को मिला जिसका नेतृत्व उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी एकनाथ शिंदे कर रहे थे। शिंदे अकेले नहीं थे, उन्होंने करीब 30 विद्रोही विधायकों को अपने साथ मिला लिया था। गत 3 वर्षों में उद्धव प्रमुख विपक्षी नेताओं में से एक के तौर पर उभरे हैं, जो ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल) तथा एम.के. स्टालिन (द्रमुक) जैसे ताकतवर मुख्यमंत्रियों के साथ कदम मिलाकर चल रहे थे। 

विडम्बना यह है कि वर्तमान समस्या सहयोगियों की ओर से नहीं है बल्कि शिवसेना के भीतर से ही उभरी है। एक भावनात्मक भाषण में हाल ही में उन्होंने कहा था कि ‘मेरे लिए दुख की बात यह है कि मेरे अपने लोग (शिवसैनिक) मुझ में विश्वास खो चुके हैं।’ पार्टी में कुछ समय से पनप रहे विद्रोह को नजरअंदाज करते हुए उद्धव ने खुद को एक तरह से अलग-थलग रखा, कोविड राहत प्रबंधनों तथा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में शामिल रहे। उन्हें यह एहसास नहीं हुआ कि उनकी प्राथमिकता अपने लोगों को साथ बनाए रखना होनी चाहिए। 

शिवसेना तथा उनकी लम्बे समय की सांझीदार भाजपा ने 2019 का चुनाव मिल कर लड़ा था। भाजपा ने 106 सीटें जीतीं जबकि शिवसेना के हाथ केवल 56 आईं। मिल कर वे 288 सदस्यीय विधानसभा में बड़ी आसानी से सरकार बना सकते थे। मगर तब शिवसेना चाहती थी कि मुख्यमंत्री के पद को आपस में बांटा जाए जैसे कि दोनों सांझीदारों के बीच चुनावों से पहले चर्चा हुई थी, लेकिन भाजपा ने उनकी मांग को ठुकरा दिया। गत एक दशक में शिवसेना ताकतवर होने की बजाय भाजपा की एक जूनियर पार्टनर बन कर रह गई। 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि शिवसेना को विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि इसके करिश्माई संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की देखरेख के अंतर्गत 3 विद्रोह हुए। वह एक आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे जिन्हें लोग सुनना पसंद करते थे, सिगार पीते थे, सनग्लासिज तथा भगवा रंग के कपड़े पहनते थे और यहां तक कि अपना पसंदीदा पेय बियर पीते थे। उनका सम्मान बेशक कुछ लोग करते थे लेकिन डरते सभी थे। 

यहां तक कि पॉप किंग माइकल जैक्सन ने भी ठाकरे के साथ फोटो खिंचवाई और भारत में अपने एकमात्र कंसर्ट के लिए उनसे क्लीयरैंस प्राप्त की। जनता को वशीभूत करने की उनकी क्षमता ने उनका कद बहुत बढ़ा दिया यद्यपि उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा और न ही सत्ता में रहे। वाकपटुता के माहिर, बाला साहेब 1995 में अपनी पार्टी को सत्ता में लाए तथा 90 के दशक में भाजपा के साथ गठबंधन किया जो कुछ दशकों तक बना रहा। उन्होंने अपने भतीजे राज ठाकरे को दरकिनार कर 2003 में अपने बेटे उद्धव को पार्टी का कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया। उद्धव अब चौथा विद्रोह देख रहे हैं। 

मगर उनकी प्राथमिक गलत गणना अपने सैनिकों पर पूरा भरोसा करना था। वह अपने सॉफ्ट हिन्दुत्व अथवा अपने गठबंधन की विवादास्पद प्रकृति या कांग्रेस के साथ गठबंधन के अपने ब्रांड को भुनाने में असफल रहे। उन्हें कुछ वरिष्ठ नेताओं की कीमत पर अपने बेटे आदित्य ठाकरे को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने को लेकर भी सतर्क रहना चाहिए था। इसकी बजाय वह अपने वरिष्ठ मंत्रियों तक के लिए अनुपलब्ध रहे। तीसरे, सैनिक गठबंधन सांझीदारों के साथ सहज नहीं हो सके क्योंकि वे दशकों तक कांग्रेस के साथ लड़ते हुए पार्टी के साथ बढ़े हैं। शिवसेना के कुछ हलकों का मानना है कि गठबंधन पार्टी के विकास को नुक्सान पहुंचा रहा था। 

चौथे, विद्रोहियों को प्रवर्तन निदेशालय (ई.डी.), सी.बी.आई. तथा आयकर अधिकारियों की ओर से जांच का डर था। इस अनावश्यक परेशानी से बचने के लिए वे एक रास्ते के तौर पर राजग में वापसी की राह देख रहे थे। दलबदल विरोधी कानून की पेचीदगियों से बचने के लिए शिंदे ग्रुप को चुने हुए सदस्यों की एक तिहाई संख्या के परीक्षण को पास करना होगा। राकांपा प्रमुख शरद पवार ने सही कहा है कि वास्तविक परीक्षा फ्लोर टैस्ट भी होगी। अत: एकनाथ शिंदे तथा उनके समर्थकों के सामने एक ही विकल्प है। 

उद्धव दो मोर्चों पर नहीं लड़ सकते-भाजपा की ताकत तथा विद्रोहियों की बढ़ती संख्या। उन्हें समझौता करना होगा या अपनी पार्टी तथा सरकार दोनों को गंवाना होगा। चूंकि शिंदे ने उद्धव को अपनी मांगों में बाला साहेब के नाम तथा विचारधारा को उभारा है इसलिए ठाकरे के गुट को बाला साहेब की विरासत को बनाए रखना भी सुनिश्चित करना होगा। 

जहां कानूनी लड़ाई महीनों तक चल सकती है, वर्तमान नाटकीय घटनाक्रम का किसी भी समय पटाक्षेप हो सकता है। संभावना इसी बात की है कि राजनीतिक बलों में एक नया तालमेल देखने को मिलेगा। पार्टी को एकजुट रखना उद्धव के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। यदि वह ऐसा कर पाते हैं तो एक सशक्त नेता के तौर पर उभरेंगे। वह लाभ की स्थिति में हैं क्योंकि पार्टी उनके साथ है। हालांकि कुछ विधायक अलग-अलग हो गए। सबसे बढ़ कर उनके पास ठाकरे उपनाम का संबल है।-कल्याणी शंकर    
 


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