सोमवार की रात करें ये दान, स्ट्रेस और डिप्रेशन सदा के लिए जाएगा भाग

Monday, February 5, 2018 7:54 AM
सोमवार की रात करें ये दान, स्ट्रेस और डिप्रेशन सदा के लिए जाएगा भाग

आधुनिक भाग-दौड़ के इस जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति तनाव का शिकार हो ही जाता है। डिप्रैशन शब्द आजकल इतना आम हो चुका है कि लोग इसे बीमारी के तौर पर नहीं लेते और नजर अंदाज कर देते हैं किन्तु ऐसा करने का परिणाम कभी-कभी बहुत ही हानिकारक हो सकता है। तनाव, मानसिक थकान से अतिरिक्त शारीरिक विकलांगता भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त इस रोग से ग्रसित व्यक्ति का मन किसी काम में नहीं लगता, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है, उदासी रहने लगती है और वह  शारीरिक स्तर पर भी थका-थका-सा अनुभव करता है। 


वैसे तो यह बीमारी किसी भी आयु के व्यक्ति को कभी भी हो सकती है, परंतु इस रोग के किशोरावस्था के जातक तथा स्त्रियां अधिक शिकार होती हैं। इस रोग का केंद्र बिन्दु मन है और मन भावुक व्यक्ति को अपनी चपेट में जल्दी लेता है। 


स्त्रियों को सृष्टि ने पुरुषों की तुलना में अधिक भावुक बनाया है परन्तु आधुनिक परिवेश में देखा जाए तो इसका भी अपवाद है। दूसरा किशोरावस्था के जातक इस रोग की चपेट में अधिक आते हैं, क्योंकि उनका मन अपने आगामी भविष्य के कल्पनीय स्वप्न संजोने लगता है। स्वप्नों की असीमित उड़ान के पश्चात जब यथार्थ के ठोस धरातल से उनका सामना होता है तो मन अवसाद ग्रस्त होने लगता है। 


डिप्रैशन जैसे मानसिक रोगों का केन्द्र बिन्दु मन है। मन शरीर का बहुत ही सूक्ष्म अवयव है, लेकिन आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार की क्रियाओं को यही प्रभावित करता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद यानी डिप्रैशन मूल रूप से मस्तिष्क में रासायनिक स्राव के असंतुलन के कारण होती है, किन्तु वैदिक ज्योतिष अनुसार इस रोग का दाता, मन को संचालित करने वाला ग्रह चन्द्रमा तथा व्यक्ति की जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव के स्वामी को माना जाता है। 


चंद्र के प्रत्यक्ष प्रभावों से तो आप सभी भलीभान्ति परिचित हैं। पृथ्वी के सबसे नजदीक होने से व्यक्ति के मन को सर्वाधिक प्रभावित यही ग्रह करता है, क्योंकि ज्योतिष में चंद्रमा का पूर्ण सम्बन्ध हमारे मानसिक क्रिया-कलापों से है। यदि चंद्रमा या चतुर्थेश नीच राशि में स्थित हो, अथवा षष्ठेश के साथ युति हो या फिर राहू या केतु के साथ युति हो कर कुंडली में ग्रहण योग निर्मित हो रहा हो तो इस रोग की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त द्वादशेश का चतुर्थ भाव में स्थित होना भी व्यक्ति के मानसिक असंतुलन का कारक है।


अवसाद से मुक्ति के लिए सबसे पहले तो पीड़ित व्यक्ति का वातावरण परिवर्तित कर देना चाहिए, लेकिन यह समझ लेना भी गलत होगा कि सिर्फ वातावरण के परिवर्तन से रोग मुक्ति संभव है। इसके अतिरिक्त उसके आत्मविश्वास को जगाने का प्रयास करते रहना चाहिए, साथ ही कुछ उपाय भी इसके निवारणार्थ हैं जिसमें पीड़ित जातक को चांदी के पात्र (गिलास आदि) में पेय पदार्थों का सेवन करना चाहिए। 


सोमवार तथा पूर्णिमा की रात्रि को चावल, दूध, मिश्री, सफेद वस्त्र व वस्तुओं इत्यादि का दान करना चाहिए। हरे रंग का परित्याग करें। चांदी में मढ़वा कर गले में द्विमुखी रुद्राक्ष धारण करें, साथ ही नित्य कच्चे दूध में सफेद चन्दन घिस कर मस्तक पर उसका तिलक करें । पूर्णिमा को चन्द्र देव को कच्चा दूध मिश्रित जल से अर्घ्य देना शुभ रहता है। 



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