कश्मीर पर अमेरिकी बयान से कूटनीतिक हलचल, 33 साल पुराने रुख से कितना बदला अमेरिका?
punjabkesari.in Thursday, Aug 20, 2026 - 06:19 PM (IST)
जम्मू-कश्मीर को लेकर अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के हालिया बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। भारत लंबे समय से जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न हिस्सा बताता रहा है, लेकिन अमेरिका की ओर से इस मुद्दे पर पहले अपनाया गया रुख कई बार भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत तथा कश्मीरियों की इच्छा के आधार पर समाधान की बात करता रहा है। ऐसे में गोर के बयान को अमेरिकी रुख में संभावित बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
शुरुआती दौर में रूख
अमेरिका की कश्मीर नीति को देखें तो शुरुआती दौर में वह संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत जनमत संग्रह की बात का समर्थन करता था। बाद के वर्षों में उसका जोर भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत के जरिए समाधान पर रहा। यही वजह है कि अमेरिकी अधिकारी की ओर से जम्मू-कश्मीर को भारत का जरूरी हिस्सा बताए जाने संबंधी टिप्पणी ने इस पुराने रुख को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बयान की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि करीब 33 साल पहले कश्मीर को लेकर अमेरिका की एक टिप्पणी ने भारत में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की थी।
पहले के बयान के मायने
अक्टूबर 1993 में तत्कालीन अमेरिकी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर साउथ एशियन अफेयर्स रॉबिन रैफेल ने वाशिंगटन में पत्रकारों की एक ब्रीफिंग के दौरान कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका महाराजा हरि सिंह द्वारा किए गए इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को इस अर्थ में मान्यता नहीं देता कि जम्मू-कश्मीर हमेशा के लिए भारत का अभिन्न अंग है।
रैफेल की इस टिप्पणी ने भारत-अमेरिका संबंधों में असहजता पैदा कर दी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने अमेरिकी बयान को ‘पिनप्रिक्स एंड माइनर मिस्चीफ’ बताया था। भारत सरकार ने भी इस पर अपना विरोध दर्ज कराया था। बाद में अमेरिकी विदेश विभाग की ओर से स्पष्टीकरण दिया गया कि कश्मीर को लेकर अमेरिका की मूल नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
अमेरिकी राजदूत के बयान से चर्चा
अब तीन दशक से अधिक समय बाद अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की टिप्पणी ने इसी पुराने घटनाक्रम को फिर चर्चा में ला दिया है। फर्क इतना है कि 1993 में अमेरिकी बयान भारत के लिए चिंता का कारण बना था, जबकि मौजूदा टिप्पणी को पाकिस्तान के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है। कश्मीर को लेकर अमेरिका के रुख में अगर वास्तव में कोई नीतिगत बदलाव आता है, तो इसका असर भारत-पाकिस्तान के रिश्तों और इस मुद्दे की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। हालांकि, किसी एक राजनयिक बयान को अमेरिकी विदेश नीति में स्थायी बदलाव मानने से पहले वाशिंगटन की आधिकारिक नीति और आगे आने वाले बयानों पर नजर रखना जरूरी होगा।
