सिविल सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सरहानीय, उम्मीद है विधायिका में भी होगी: उपराष्ट्रपति
punjabkesari.in Tuesday, Apr 21, 2026 - 09:06 PM (IST)
नेशनल डेस्क : उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने मंगलवार को सिविल सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना की और उम्मीद जताई कि संसद और राज्य विधानसभाओं में भी जल्द ही ऐसी ही प्रगति देखने को मिलेगी। यहां 'सिविल सेवा दिवस' समारोह के दौरान अधिकारियों की एक सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने बताया कि सिविल सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी 2016 में लगभग 21 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में लगभग 31 प्रतिशत हो गई है। उन्होंने कहा, ''सिविल सेवाओं में शीर्ष स्थान हासिल करने वालों में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। हमने वाकई एक लंबा सफर तय किया है। विभिन्न जिलों के अपने दौरे के दौरान भी मुझे महिला अधिकारियों को पुलिस आयुक्त, जिलाधिकारी और एसपी (पुलिस अधीक्षक) के पदों पर देखकर खुशी हुई। यह प्रगति 'नारीशक्ति' का एक सशक्त प्रमाण है, जहां प्रतिभा रूढ़ियों से ऊपर उठती है और दृढ़ संकल्प हर बाधा पर विजय प्राप्त करता है।"
राधाकृष्णन ने कहा कि यह वृद्धि केवल संख्यात्मक प्रगति नहीं है, बल्कि मानसिकता में एक मूलभूत बदलाव को दर्शाती है। उन्होंने कहा, "यह एक बेहद स्वागत योग्य रुझान है। यह हमें याद दिलाता है कि जब महिलाओं को समान अवसर मिलते हैं, तो वे न केवल सफल होती हैं, बल्कि सफलता के मायने ही बदल देती हैं। मुझे उम्मीद है कि भविष्य में संसद और राज्य विधानसभाओं की संरचना में भी इसी तरह का परिवर्तन देखने को मिलेगा।'' उनकी यह टिप्पणी हाल ही में निचले सदन में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 के संसद में पारित नहीं होने के बाद आई है। यहां महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयेक था।
इस विधेयक का उद्देश्य परिसीमन के बाद विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत कोटा लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाना था। सिविल सेवकों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि कुछ दशक पहले तक जिलाधिकारी या पुलिस आयुक्त के पदों पर बहुत कम महिलाओं की नियुक्ति होती थी, लेकिन आज स्थिति में काफी बदलाव आ चुका है। राधाकृष्णन ने कहा कि पिछले दशक में सिविल सेवाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2016 में लगभग 21 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में लगभग 31 प्रतिशत हो गई है, और इसे उन्होंने 'एक उत्साहजनक और सार्थक परिवर्तन' बताया। उन्होंने जोर देकर कहा, ''मैं महिलाओं की रुचि की सराहना करता हूं और वे पुरुषों के बराबर, बल्कि उनसे भी अधिक योगदान देंगी।''
उपराष्ट्रपति ने कहा कि सबसे गरीब लोगों और उनकी जरूरतों का ध्यान रखना जरूरी है। 'मुफ्त सुविधाओं' का जिक्र करते हुए राधाकृष्णन ने कहा, ''हमें विकास करना है, धन सृजित करना है और जरूरतमंद लोगों की सेवा करनी है। (लेकिन) हमें सबको शामिल नहीं करना चाहिए। अगर आप सबको शामिल कर लेंगे, तो हर कोई लाभार्थी बन जाएगा। फिर पैसा यूं ही खर्च हो जाएगा। असल जरूरतमंद लोगों की मदद होनी चाहिए...।'' उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंतिम छोर तक सहायता पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित करके और जमीनी हकीकतों के प्रति संवेदनशील रहकर, सिविल सेवक 'शासन को अधिक समावेशी, अधिक प्रभावी और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं'।
राधाकृष्णन ने कहा कि किसी पहल या कल्याणकारी कार्यक्रम की योजना दिल्ली में बनाई जा सकती है, लेकिन इसके परिणाम दूरदराज के गांवों में तभी दिखाई देते हैं जब इसे वास्तविक रूप से लागू किया जाता है। उपराष्ट्रपति ने सिविल सेवकों से एआई, मशीन लर्निंग और ब्लॉकचेन जैसी नई तकनीकों को अपनाने का आग्रह किया, क्योंकि ये दक्षता, पारदर्शिता और नागरिक सेवा में सुधार के अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने राज्यों से शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए भविष्योन्मुखी भर्ती नीतियों को अपनाने का भी आग्रह किया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि कुछ राज्यों ने अपनी भर्ती प्रणाली में कोई बदलाव नहीं किया है, क्योंकि किसी भी डिग्री धारक को तकनीशियन के पद के लिए आवेदन करने की अनुमति है। राधाकृष्णन ने कहा, ''औपनिवेशिक मानसिकता के लिहाज से कोई भी डिग्री अच्छी है क्योंकि उन्हें केवल क्लर्क चाहिए।'' उन्होंने बताया कि सिविल सेवाओं में टेक्नोक्रेट और मेडिकल डिग्री धारकों का चयन हो रहा है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि चरित्र और ईमानदारी लोक सेवा की बुनियाद हैं, और जो लोग सीधे-सादे होते हैं उन पर हमेशा दबाव बना रहता है।
