300 रुपए का एक खीरा ! नॉर्वे में भारतीय ने दिखाई सब्जियों की कीमत, पूछा-क्या भारत में किसानों को मिल रहा मेहनत का सही दाम?

punjabkesari.in Wednesday, Sep 30, 2026 - 02:24 PM (IST)

Oslo: नॉर्वे में रह रहे एक भारतीय की सोशल मीडिया पोस्ट ने सब्जियों की कीमतों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विनोद नाम के व्यक्ति ने नॉर्वे के एक बाजार में जैविक नींबू, टमाटर और खीरे की कीमतों का वीडियो साझा किया। उनके मुताबिक, वहां एक किलो नींबू करीब 850 रुपए, टमाटर करीब 680 रुपए किलो और एक खीरा करीब 300 रुपए में मिल रहा है। भारत में इनकी कीमतों से तुलना करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर भारतीय किसानों को उनकी मेहनत का उचित हिस्सा मिल रहा है या नहीं।  विनोद ने एक्स पर साझा पोस्ट में लिखा कि नॉर्वे में कई साल रहने के बावजूद जब भी वह बाजार में खरीदारी करने जाते हैं, वहां सब्जियों की कीमतें उन्हें हैरान करती हैं।  

 

भारत से की सब्जियों की कीमतों की तुलना
विनोद ने भारत के महानगरों में मिलने वाली कीमतों से भी इसकी तुलना की। उनके मुताबिक, भारत में गुणवत्ता के आधार पर नींबू करीब 90 से 110 रुपए किलो, टमाटर करीब 60 से 80 रुपए किलो और खीरा करीब 20 से 30 रुपए प्रति पीस मिल सकता है। हालांकि, ये कीमतें उनके व्यक्तिगत तुलना के आंकड़े हैं और अलग-अलग शहरों, मौसम, गुणवत्ता, बाजार तथा बिक्री के स्थान के अनुसार सब्जियों के दाम बदल सकते हैं। विनोद ने दावा किया कि उनकी तुलना में भारत में सब्जियां नॉर्वे के मुकाबले कई गुना सस्ती हैं। इसके बाद उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भारत में कम खुदरा कीमतों का फायदा किसानों तक पर्याप्त रूप से पहुंचता है।

 


विनोद ने लिखा कि यह केवल नॉर्वे की महंगी जीवन-यापन लागत, वेतन, आयात और वहां की बाजार व्यवस्था का सवाल नहीं है। उनका कहना था कि कीमतों की तुलना उन्हें यह सोचने पर मजबूर करती है कि भारत में किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल रहा है या नहीं।उन्होंने अपने अनुयायियों से सवाल किया कि क्या भारत किसानों को उचित दाम देने में असफल हो रहा है। उनकी पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर कृषि उपज की कीमत, किसान की आय और उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत के बीच अंतर को लेकर बहस शुरू हो गई।

 

सोशल मीडिया पर अलग-अलग राय
एक उपयोगकर्ता ने तर्क दिया कि किसानों को उनकी उपज का उचित हिस्सा नहीं मिलता, जबकि शहरों में उपभोक्ता कई बार अपेक्षाकृत अधिक कीमत चुकाते हैं। टिप्पणी में इस अंतर का फायदा बिचौलियों को मिलने का दावा किया गया।वहीं, दूसरे उपयोगकर्ता ने कहा कि केवल सब्जियों की कीमतों की तुलना करके निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उसके मुताबिक, अलग-अलग देशों की प्रति व्यक्ति आय, आय का वितरण और जीवन-यापन की लागत को भी तुलना में शामिल किया जाना चाहिए।एक अन्य उपयोगकर्ता ने विनोद की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने सस्ती भारतीय सब्जियों के पीछे किसानों की आय के सवाल को उठाया। उसने तर्क दिया कि विदेशों में महंगी सब्जियों को देखकर भारत की कम कीमतों की तारीफ करने से पहले यह भी देखना चाहिए कि कम कीमत का असर किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े अन्य लोगों पर क्या पड़ता है।

 

किसान को मिलने वाली कीमत और उपभोक्ता द्वारा चुकाई जाने वाली खुदरा कीमत हमेशा समान नहीं होती। खेत से बाजार तक पहुंचने के दौरान परिवहन, भंडारण, छंटाई, पैकेजिंग, थोक कारोबार और खुदरा बिक्री जैसी कई प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसी वजह से किसी सब्जी की दुकान पर दिखाई देने वाली कीमत से सीधे यह निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है कि किसान को उसी अनुपात में भुगतान मिला होगा। इसके अलावा, भारत में सब्जियों के दाम मौसम, उत्पादन, स्थानीय मांग, आपूर्ति, फसल खराब होने और अलग-अलग मंडियों की परिस्थितियों के कारण तेजी से बदल सकते हैं।

 

नॉर्वे और भारत की आय में तुलना भी अहम
सोशल मीडिया पर बहस का एक प्रमुख मुद्दा यह भी रहा कि केवल रुपए में कीमतों की तुलना करने से दोनों देशों के उपभोक्ताओं की वास्तविक आर्थिक स्थिति का पूरा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।नॉर्वे में मजदूरी, कर, आयात लागत, कृषि उत्पादन की परिस्थितियां और जीवन-यापन की लागत भारत से अलग हैं। इसलिए किसी वस्तु की कीमत को वहां की औसत आय और घरेलू खर्च के अनुपात में देखना भी जरूरी है।इसी वजह से वायरल पोस्ट ने एक सीधा सवाल जरूर खड़ा किया है, लेकिन नॉर्वे और भारत की सब्जियों की कीमतों की यह व्यक्तिगत तुलना अपने आप में भारतीय किसानों को मिलने वाले वास्तविक मूल्य का निर्णायक प्रमाण नहीं है।
 


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Content Writer

Tanuja

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