ईरान–इजराइल तनाव से भारतीय कारोबारियों की बढ़ी चिंता, बासमती चावल और चाय निर्यात पर गहराया संकट
punjabkesari.in Sunday, Mar 01, 2026 - 05:37 PM (IST)
नेशनल डेस्क : 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर संयुक्त हमला किए जाने के बाद पश्चिम एशिया में तनाव काफी बढ़ गया है। इस बढ़ते टकराव का असर अब भारत के व्यापार पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। खासकर बासमती चावल और चाय के निर्यात को लेकर भारतीय कारोबारियों की चिंता बढ़ गई है।
बासमती चावल निर्यात पर सबसे बड़ा असर
ईरान भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा खरीदार देश है। युद्ध से पहले पिछले दो महीनों में ईरानी आयातकों ने भारत से बड़ी मात्रा में बासमती चावल के ऑर्डर दिए थे। मांग बढ़ने की वजह से घरेलू बाजार में बासमती चावल की कीमत लगभग 10 रुपये प्रति किलो तक बढ़ गई थी।
लेकिन संघर्ष शुरू होने के बाद भारत से ईरान को बासमती चावल की आपूर्ति लगभग ठप हो गई है। एक खेप जो पहले ही भेजी जा चुकी थी, वह अभी समुद्री रास्ते में है। मौजूदा हालात को देखते हुए यह स्पष्ट नहीं है कि ईरानी आयातक उस माल की डिलीवरी ले पाएंगे या नहीं। इससे निर्यातकों को भुगतान और आपूर्ति दोनों को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
ईरान और इराक भारत के प्रमुख बाजार
आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल बासमती चावल निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा ईरान को जाता है, जबकि करीब 20 प्रतिशत इराक को निर्यात होता है। दोनों देशों को मिलाकर भारत हर साल 20 लाख टन से अधिक बासमती चावल भेजता है, जिसकी कुल कीमत 2 अरब डॉलर से ज्यादा होती है। पिछले वर्ष केवल ईरान को ही करीब 1.2 अरब डॉलर का बासमती चावल निर्यात किया गया था। ऐसे में यदि क्षेत्रीय तनाव जारी रहता है तो न केवल ईरान बल्कि इराक और मध्य एशिया के अन्य देशों में भी निर्यात प्रभावित होने की संभावना है।
चाय निर्यात पर भी पड़ सकता है प्रभाव
इस संघर्ष का असर केवल चावल तक सीमित नहीं है। भारत से ईरान को होने वाले चाय निर्यात पर भी असर पड़ सकता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने ईरान को लगभग 7 अरब रुपये की चाय निर्यात की थी। यदि हालात लंबे समय तक अस्थिर बने रहते हैं तो चाय कारोबार को भी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
व्यापारियों में बढ़ी चिंता
मौजूदा स्थिति ने भारतीय निर्यातकों के सामने अनिश्चितता की स्थिति पैदा कर दी है। यदि समुद्री मार्ग, भुगतान व्यवस्था या आयात प्रक्रिया प्रभावित होती है, तो इसका सीधा असर भारतीय किसानों, मिल मालिकों और निर्यात कंपनियों पर पड़ सकता है।
