'बेटी को जीते जी नहीं मिला न्याय...' मणिपुर हिंसा में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई पीड़िता की मौत
punjabkesari.in Sunday, Jan 18, 2026 - 01:37 PM (IST)
नेशनल डेस्क। मणिपुर जातीय संघर्ष की काली छाया ने एक और बेगुनाह जिंदगी को निगल लिया है। मई 2023 में इंफाल में अपहरण के बाद सामूहिक बलात्कार (Gangrape) की शिकार हुई कुकी जनजाति की महिला ने करीब ढाई साल तक शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलने के बाद दम तोड़ दिया। उसके परिवार के लिए दुख की बात यह रही कि उनकी बेटी अपनी अंतिम सांस तक न्याय के लिए तरसती रही।
सदमे और चोटों से कभी उबर नहीं पाई मुस्कुराती हुई बेटी
पीड़िता की मां ने भावुक होते हुए बताया कि उनकी बेटी कभी बहुत खुशमिजाज और मिलनसार हुआ करती थी। वह इंफाल में एक ब्यूटी पार्लर में काम करती थी और अपने भविष्य को लेकर उत्साहित थी लेकिन मई 2023 की उस खौफनाक रात ने सब कुछ बदल दिया। घटना के बाद उसे गहरे मानसिक आघात और गर्भाशय से जुड़ी गंभीर जटिलताएं हुईं। उसका इलाज गुवाहाटी और कोहिमा के अस्पतालों में चला। चोटें इतनी गंभीर थीं कि उसे सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी थी। अंततः 10 जनवरी 2026 को उसने दम तोड़ दिया।
क्या था पूरा मामला? (मई 2023 की वो काली रात)
मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़कने के तुरंत बाद पीड़िता का इंफाल से अपहरण कर लिया गया था। स्वदेशी जनजातीय नेता मंच (ITLF) के अनुसार उसे लैंगगोल ले जाया गया जहां उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। हमलावरों ने उसे अधमरा समझकर बिष्णुपुर में छोड़ दिया था। वह सब्जियों के ढेर के नीचे छिपकर और एक ऑटो चालक की मदद से किसी तरह सुरक्षित स्थान पर पहुंच पाई। राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाने के कारण वह घटना के दो महीने बाद 21 जुलाई 2023 को पुलिस में शिकायत दर्ज करा पाई थी।
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श्रद्धांजलि और कैंडललाइट मार्च
पीड़िता की याद में आईटीएलएफ (ITLF) ने चुराचंदपुर में एक कैंडललाइट मार्च का आयोजन किया है। संगठन का कहना है कि यह केवल एक मौत नहीं है बल्कि यह न्याय व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।
मणिपुर हिंसा: एक दुखद आंकड़ा
मई 2023 से शुरू हुए इस जातीय संघर्ष ने पूरे राज्य को दो हिस्सों में बांट दिया है:
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मौतें: अब तक 260 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
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विस्थापन: लगभग 50,000 लोग अपने घरों को छोड़कर शिविरों में रहने को मजबूर हैं।
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मुद्दे: हिंसा की मुख्य वजह भूमि अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर समुदायों के बीच आपसी विवाद रहा है।
