तलाक के बाद महिलाओं के पास होते हैं ये पावरफुल अधिकार, जानें क्या है एलिमनी और कस्टडी के नियम?

punjabkesari.in Friday, Mar 06, 2026 - 02:14 PM (IST)

Legal Rights of Divorced Women in India : वैवाहिक जीवन में अलगाव एक दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि एक महिला के पास कोई अधिकार नहीं रह जाते। भारतीय न्याय प्रणाली में महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा देने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इस महिला दिवस पर आइए जानते हैं उन अधिकारों के बारे में जो हर महिला को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करते हैं।

1. भरण-पोषण (Alimony): आर्थिक मजबूती का आधार

तलाक के बाद एक महिला के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी जीवनशैली और खर्चों को बनाए रखना होती है। कानून उसे पति से गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार देता है। अदालत पति-पत्नी की कमाई, उनकी उम्र, स्वास्थ्य और शादी कितने साल चली इन सब बातों को देखकर भरण-पोषण की राशि तय करती है। यह सहायता या तो हर महीने (Monthly) मिल सकती है या फिर एक ही बार में मोटी रकम (Lump-sum) के तौर पर ली जा सकती है। खास बात यह है कि अगर महिला नौकरी कर रही है लेकिन उसकी आय अपनी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है तो वह भी गुजारा भत्ता मांग सकती है।

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2. वैवाहिक घर में रहने का अधिकार: छत छीनने का डर खत्म

तलाक की प्रक्रिया के दौरान कई महिलाओं को डर रहता है कि उन्हें घर से निकाल दिया जाएगा। कानून कहता है कि एक पत्नी को उस घर में रहने का पूरा अधिकार है जहां वह पति के साथ रह रही थी। भले ही वह मकान पति के नाम हो या किराए का हो उसे बिना कानूनी आदेश के बेदखल नहीं किया जा सकता। यदि ससुराल पक्ष उसे घर से निकालने की कोशिश करता है तो घरेलू हिंसा कानून (Domestic Violence Act) के तहत महिला सुरक्षा और वैकल्पिक आवास की मांग कर सकती है।

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3. स्त्रीधन पर पूरा मालिकाना हक

शादी के समय महिला को मिले गहने, कैश या उपहार स्त्रीधन कहलाते हैं। तलाक की स्थिति में इन पर केवल और केवल महिला का हक होता है। पति या ससुराल वाले इन्हें अपने पास नहीं रख सकते। यदि वे इसे वापस करने में आनाकानी करते हैं तो महिला कानून का सहारा ले सकती है।

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4. बच्चों की कस्टडी और संरक्षण

तलाक के मामलों में बच्चों का भविष्य सबसे ऊपर रखा जाता है। आमतौर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कस्टडी मां को दी जाती है लेकिन बच्चों का खर्च (Child Support) पिता को उठाना होता है। कानून यह सुनिश्चित करता है कि अलग होने के बाद भी बच्चों की शिक्षा और परवरिश में कोई कमी न आए।


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Content Editor

Rohini Oberoi

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