जल्द जारी की जाएगी JEE Main की नोटिफिकेशन, टैस्ट के लिए अलग से सिलेबस जारी करेगी NTA

2020-11-26T16:42:31.413

जालंधर: नैशनल टैस्टिंग एजैंसी (एन.टी.ए.) अगले साल होने वाली जे.ई.ई (मेन्स) की परीक्षा के लिए जल्द ही अधिसूचना जारी करेगी और इसके लिए अलग से सिलेबस भी जारी किया जाएगा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने पंजाब केसरी को दिए गए विशेष इंटरव्यू में यह जानकारी दी है। दरअसल इस परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थी इस बात को लेकर दुविधा में थे कि परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन अभी तक शुरू नहीं हुआ है। ऐसे में छात्रों के मन में यह सवाल उठ रहा था कि इस साल यह परीक्षा जनवरी में हो भी पाएगी या नहीं। हालांकि परीक्षा की तिथि में बदलाव तय है, लेकिन एन.टी.ए. इसके लिए जल्द ही आधिकारिक अधिसूचना जारी करेगा। शिक्षा मंत्री ने इस इंटरव्यू के दौरान पंजाब केसरी द्वारा उठाए गए शिक्षा नीति, अध्यापकों पर बढ़े गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ और विदेशों में जा रहे भारत के प्रतिभावान छात्रों के मुद्दे पर सवालों के जवाब दिए। पेश है शिक्षा मंत्री का पूरा इंटरव्यू:

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प्रश्न: जे.ई.ई. के हर साल जनवरी में होने वाले एग्जाम के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है, क्या इस साल जनवरी में यह एग्जाम होगा, यदि हां तो रजिस्ट्रेशन कब शुरू होगी?
उत्तर: एन.टी.ए. कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के प्रति सतर्क ता बरत रहा है, स्थिति की पूरी तरह से जांच करने के बाद एन.टी.ए. परीक्षा की आधिकारिक अधिसूचना जारी करेगा। परीक्षा का आयोजन पूरी एहतियात के साथ किया जाएगा, जैसे सितम्बर में किया गया था। इस बार  एन.टी.ए.फिर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि छात्रों को परीक्षा केंद्र उनकी पहली तरजीह पर मिले।


प्रश्न: सी.बी.एस.ई. और आई.सी.आई.सी.आई. बोर्ड ने अपना सिलेबस 30 फीसदी कम किया है, क्या जे.ई.ई. का एग्जाम काटे गए सिलेबस के मुताबिक आएगा?
उत्तर: सी.बी.एस.ई.की ओर से शैक्षणिक वर्ष 2020-21 के लिए तैयार किए गए पाठ्यक्रम में 30 फीसदी कमी करने का मकसद कोरोना संकट में छात्रों के भार को कम करना था। मुख्य तत्वों को बनाए रखते हुए पाठ्यक्रम को कम किया गया है। इसके चलते जे.ई.ई. परीक्षा प्रभावित नहीं होगी, क्योंकि जे.ई.ई. परीक्षा में मुख्य तौर पर उनकी योग्यताओं के परीक्षण पर ध्यान दिया जाता है। इस संबंध में एन.टी.ए. आधिकारिक तौर पर परीक्षा का पाठ्यक्रम जारी करेगा।

 

प्रश्न: नौवीं से बारहवीं कक्षा के लिए स्कूल खुले हैं लेकिन छोटी कक्षाओं के लिए अभी कोई फैसला नहीं हुआ है। क्या इस सत्र में स्कूल खोले जाने की कोई योजना है?
उत्तर: कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई जारी है। हमें इससे लडऩे के लिए पर्याप्त उपाय करने चाहिएं। गृह मंत्रालय (एम.एच.ए.) द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्कूलों और कोचिंग संस्थानों को फिर से खोलने के लिए, राज्य/केन्द्र शासित प्रदेश सरकारों को 15 अक्तूबर 2020 के बाद एक सूचीबद्ध तरीके से निर्णय लेने की छूट दी गई है। स्थिति के आकलन के आधार पर ही संबंधित स्कूल / संस्थान प्रबंधन के परामर्श से निर्णय लिया जाएगा। अभी की स्थिति को देखते हुए ऑनलाइन / डिस्टैंस लर्निंग शिक्षण का तरीका बना रहेगा और इसे प्रोत्साहित किया जाएगा।

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प्रश्न: आठवीं, नौवीं और ग्यारहवीं कक्षा तक के छात्रों के एग्जाम कैसे होंगे? क्या ये ऑनलाइन होंगे क्योंकि कई स्कू ल छात्रों को ऑनलाइन एग्जाम के लिए कह रहे हैं?
उत्तर: एम.एच.ए. ने पहले से ही एक क्रमबद्ध तरीके से स्कू लों को फिर से खोलने के निर्देश दिए हैं। छात्रों को बुलाने के निर्णय संबंधित स्कूल/ संस्थान प्रबंधन के साथ परामर्श करके, उनकी स्थिति के आकलन के आधार पर किया जाएगा। स्कूलों/ कॉलेजों में परीक्षाएं होने पर संस्थानों द्वारा कोरोना वायरस को लेकर जारी हुई सभी गाइडलाइंस की पालना सुनिश्चित की जाएगी। एक तरफ देश में कोरोना काल चल रहा था और इसी बीच नई शिक्षा नीति की घोषणा की गई। क्या यह इस घोषणा के लिए सही समय था । कोविड-19 ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली के लिए कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं जिसका उत्तर ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ है। ये शिक्षा प्रणाली समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों को पूरा करने पर जोर देती है। इससे आगे ‘दीक्षा’- ‘एक भारत, एक डिजिटल मंच’, ई-विद्या / आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत ऑनलाइन शिक्षा आदि कौशल विकास पर जोर देती है। इससे आगे आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत नई शिक्षा प्रणाली सैकेंडरी स्कू लों में ही वोकेशनल कोर्स के जरिए इंडियन नॉलेज सिस्टम और स्किल डिवैल्पमैंट पर ध्यान केंद्रित कर रही है ताकि विद्यार्थी अपना रास्ता खुद बना सकें। ये नीति भारत  को  ग्लोबल  स्टडी डैस्टीनेशन  के  रूप  में  आगे बढ़ाएगी, जहां कम दाम में उच्च गुणवत्ता की शिक्षा हासिल की जा सके। ये शिक्षा नीति रिसर्च और इंडस्ट्री के साथ भागीदारी सुनिश्चित करके घरेलू विनिर्माण / सेवा उद्योग को बढ़ावा देगी। 

 

प्रश्न: क्या कोरोना के कारण नई शिक्षा नीति को लागू करने का सरकार का लक्ष्य प्रभावित होगा?
उत्तर: शिक्षा मंत्रालय नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए एक मिशन मोड पर काम कर रहा है। सूचीबद्ध योजना तैयार करने के लिए 8 सितम्बर से 25 सितम्बर 2020 तक विभिन्न मंत्रियों, अध्यापकों, कुलपतियों के साथ विचार-विमर्श करने के लिए ‘शिक्षा पर्व’ आयोजित किया गया था। इसमें अंतर्गत राज्यपाल, राज्य के शिक्षा मंत्रियों, शिक्षकों, छात्रों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बारे में बताने के लिए यह प्रोग्राम चलाया गया था। विभाग ने एक कार्यान्वयन योजना/ टास्क-सूची तैयार की है जिसमें टास्क, टाइमलाइन और आऊटपुट को पूरा करने के लिए जिम्मेदार एजैंसियों के साथ एन.ई.पी. की प्रत्येक  सिफारिश  को  जोड़ा गया है। इस योजना का मुख्य फोकस गतिविधियों को इस तरह से परिभाषित करना है ताकि केंद्र और राज्यों की ओर से संयुक्त कार्यान्वयन और निगरानी की जा सके। 


प्रश्न: अतीत में आई शिक्षा नीति वित्तीय कारणों से अपने मकसद में सफल नहीं रही है। क्या नई नीति को लागू करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं?
उत्तर: पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति की शुरूआत 1986 में हुई और 1992 में संशोधित की गई थी। नीति के कई हिस्सों को अलग-अलग लागू किया गया था। इसमें शिक्षा में एकरूपता लाने, सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने, लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर देने के साथ प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालयों जैसे विद्यालयों की स्थापना, माध्यमिक शिक्षा का व्यवसायीकरण, ज्ञान का संश्लेषण और उच्च शिक्षा में अंतर-अनुशासनात्मक अनुसंधान, राज्यों में अधिक ओपन यूनिवर्सिटी शुरू करना, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद को मजबूत करना, खेल, शारीरिक शिक्षा, योग को प्रोत्साहित करना और एक प्रभावी मूल्यांकन पद्धति को अपनाना शामिल था। हालांकि, एन.पी.ई. के 1986 के बाद से तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है। इस अवधि के दौरान हमारे देश, समाज, अर्थव्यवस्था और दुनिया में बड़े पैमाने पर महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप, कार्यान्वयन योजना मंत्रालय द्वारा तैयार की जाती है जो विभिन्न निकायों द्वारा की जाने वाली प्रमुख क्रियाओं की समय-सीमा के साथ-साथ समीक्षा के लिए एक योजना तैयार करती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नीति को उसकी भावना और इरादे में लागू किया जाए। 

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प्रश्न: नई शिक्षा नीति में पांचवीं तक की शिक्षा क्षेत्रीय भाषा में करवाने की बात की गई है लेकिन अंग्रेजी और प्राइवेट स्कू ल तो पांचवीं तक के बच्चों को अंग्रेजी में ही शिक्षा देंगे। ऐसे में क्या सरकारी स्कू लों के छात्र निजी स्कू लों के मुकाबले पिछड़े रहेंगे?
उत्तर: एन.ई.पी. की सिफारिशें निजी और सरकारी स्कू लों की सहमति से ली गई हैं। एन.ई.पी. के अनुसार- जहां भी संभव हो पांचवीं तक पढ़ाई मातृभाषा में कराई जाए। उसके बाद ग्रेड 8 और उससे आगे तक पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा / स्थानीय भाषा / क्षेत्रीय भाषा होगी। इसके बाद घर / स्थानीय भाषा को जहां तक भी संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा। इसके अलावा, नीति अंग्रेजी भाषा दरकिनार करने की बात नहीं करती, बल्कि इसमें बहुभाषा ज्ञान पर जोर दिया गया है। 


प्रश्न: देश के अध्यापक पढ़ाने के साथ -साथ तमाम सरकारी सर्वे और अन्य काम में व्यस्त रहते हैं और इसके बावजूद उन्हें सम्मानजनक वेतन नहीं मिल पाता और छात्रों की शिक्षा का अलग नुक्सान होता है। आप खुद शिक्षक रहे हैं उनकी पीड़ा अच्छे से समझते हैं, क्या इस दिशा में कोई काम हो रहा है?
उत्तर: गैर-शिक्षण गतिविधियों को रोकने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों से दूर रखने पर काम किया जा रहा है। इसके साथ ही मिड- डे मील आदि कार्यों में भी अध्यापकों को कम से कम इन्वॉल्व करने पर विचार किया जा रहा है, ताकि वे अपना पूरा ध्यान बच्चों को पढ़ाने पर केंद्रित कर सकें। मंत्रालय स्कूलों में अध्यापकों के लिए अच्छा वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है ताकि अध्यापक अपनी पूरी क्षमता और प्रभावी ढंग से अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें ।


फ्रांस, जापान जैसे देशों में शिक्षा का माध्यम है मातृभाषा


प्रश्न: क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा को लेकर दक्षिण के राज्यों में विरोध के स्वर उठे हैं। इसे पूरे देश में लागू करने पर आम सहमति कैसे बनेगी?
उत्तर: शिक्षा मंत्रालय ने एन.ई.पी. का गठन करते समय समावेशी, भागीदारी और समग्र दृष्टिकोण कठोर परामर्श प्रक्रिया का आयोजन किया है। 2.5 लाख ग्राम पंचायतों, 6600 ब्लॉक, 6000 शहरी स्थानीय निकायों और 676 जिलों से दो लाख सुझावों को मई 2015 और अक्तूबर 2015 के बीच प्राप्त किया गया था। फ्र ांस, जापान जैसे देशों में शिक्षा का माध्यम उनकी मातृभाषा है। यदि हम विकसित देशों को देखते हैं, तो उनमें से अधिकांश ने यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी कोशिश की है कि बच्चे मातृभाषा में अध्ययन करें। युवा बच्चे अपनी घरेलू भाषा/मातृभाषा में अनौपचारिक अवधारणाओं को जल्दी सीख और समझ लेते हैं। इसीलिए नई शिक्षा नीति के पैरा 4.11 में कहा गया है- जहां तक संभव हो, कम से कम ग्रेड 5 तक यह शिक्षा का माध्यम हो लेकिन ग्रेड 8 में घर की भाषा / मातृभाषा / स्थानीय भाषा / क्षेत्रीय भाषा होगी। इसके बाद घर / स्थानीय भाषा को जहां भी संभव हो भाषा के रूप में पढ़ाया जाता रहेगा। इसके अलावा, आर.टी.ई. अधिनियम 2009 की धारा 29 (2) (एफ) में कहा गया है कि शिक्षा का माध्यम, जहां तक संभव हो, मातृभाषा ही होगी। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित सभी भाषाओं के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से भाषा के अध्यापकों की नियुक्ति की जाएगी। राज्यों में भी एक- दूसरे क्षेत्र से अध्यापकों की नियुक्ति को बढ़ावा मिलेगा। राज्यों में त्रिभाषा फार्मूले को प्रोत्साहित किया जाएगा। मुझे खुशी है कि असम, उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों ने एन.ई.पी. की सिफारिशों को अपनाना शुरू कर दिया है।


देश में आएंगे विदेशी विश्वविद्यालय, रुकेगा ब्रेन-ड्रेन
 

प्रश्न: भारतीयों छात्रों के विदेशी प्रेम के कारण हो रहे ब्रेन-ड्रेन को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

उत्तर: भारत में 15 से 29 वर्ष के बीच की 35 प्रतिशत आबादी युवाओं की है। जनसांख्यिकी भारत को $5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बनाना सुनिश्चित करती है ताकि युवा भारत में रहकर वैश्विक दुनिया के विकास के लिए काम कर सकें। एन.ई.पी. के मुताबिक केवल उच्च गुणवत्ता वाले विदेशी संस्थानों के साथ अनुसंधान / शिक्षण सहयोग और संकाय / छात्र आदान-प्रदान की सुविधा होगी और इसके लिए पारस्परिक लाभकारी विदेशों के साथ अनुबंध किए जाएंगे। दुनिया के 100 चुनिंदा विश्वविद्यालयों को भारत में अपने संस्थान खोलने में मदद की जाएगी। इससे ब्रेन-ड्रेन रोकने में मदद मिलेगी। ऐसा करने के लिए मानदंडों को ध्यान में रखकर एक विधायी रूपरेखा तैयार की जाएगी। इस प्रकार, एन.ई.पी. के माध्यम से हम छात्रों और वैश्विक दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा प्रणाली को फिर से जीवंत कर सकेंगे।


प्राइवेट सैक्टर की मनमानियों पर रोक लगाएगी नई शिक्षा नीति

प्रश्न: नई शिक्षा नीति पर आरोप लग रहे हैं कि इससे शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा और डिग्रियां बिकने लगेंगी। इस पर कैसे नियंत्रण किया जाएगा?

उत्तर: चैक और बैलेंस के साथ कई तंत्र स्कू ल और उच्च शिक्षा के व्यवसायीकरण का मुकाबला करेंगे। आवश्यक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए पूर्व-विद्यालय, निजी, सार्वजनिक और परोपकारी सहित शिक्षा के सभी चरणों के लिए एक प्रभावी गुणवत्ता स्व-विनियमन या मान्यता प्रणाली स्थापित की जाएगी। राज्य / संघ राज्य क्षेत्र एक स्वतंत्र, राज्यव्यापी निकाय स्थापित करेंगे, जिसे राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एस.एस.एस.ए.) कहा जाएगा, जो मानकों का एक न्यूनतम सैट स्थापित करेगा। इस जानकारी का स्व-खुलासा किया जाएगा और इसे एस.एस.एस.ए. द्वारा बनाई गई सार्वजनिक वैबसाइट पर उपलब्ध कराया जाएगा। इससे प्राइवेट सैक्टर की मनमानियों पर रोक लगेगी। उच्च शिक्षा स्तर पर, सभी शैक्षणिक संस्थानों को ऑडिट और प्रकटीकरण के समान मानकों के लिए आयोजित किया जाएगा। एन. ए.सी.द्वारा विकसित मान्यता प्रणाली इस प्रणाली पर एक पूरक जांच प्रदान करेगी और एन.एच.ई.आर.सी. इसे अपने नियामक उद्देश्य के प्रमुख आयामों में से एक के रूप में मानेगा। परोपकारी और सार्वजनिक-उत्साही इरादे वाले निजी एच. ई.आई.को फीस निर्धारण के प्रगतिशील शासन के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाएगा। अपनी मान्यता के आधार पर विभिन्न प्रकार के संस्थानों के लिए एक ऊपरी सीमा के साथ फीस तय करने के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि व्यक्तिगत संस्थानों पर प्रतिकू ल प्रभाव न पड़े। निजी एच.ई.आई. द्वारा निर्धारित सभी शुल्क पारदर्शी रूप से और पूरी तरह से बताए जाएंगे और किसी भी छात्र के नामांकन की अवधि के दौरान कोई मनमानी वृद्धि नहीं होगी। यह शुल्क निर्धारण तंत्र, यह सुनिश्चित करते हुए लागत की उचित वसूली सुनिश्चित करेगा कि एच.ई.आई.अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करता है।
 


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