क्या दफ्तर में काम के दौरान सोने की इजाजत है? हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला
punjabkesari.in Wednesday, Feb 26, 2025 - 03:59 PM (IST)
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नेशनल डेस्क: कर्नाटक राज्य परिवहन निगम (केकेआरटीसी) के एक ट्रांसपोर्ट कांस्टेबल चंद्रशेखर का मामला हाल ही में चर्चा में आया जब उसे ड्यूटी के दौरान 10 मिनट की झपकी लेने के कारण निलंबित कर दिया गया। चंद्रशेखर को लगातार दो महीने तक 16 घंटे की शिफ्ट में काम करने के बाद, एक दिन ड्यूटी के दौरान सोते हुए पाया गया। इसके बाद उसे निलंबित कर दिया गया, लेकिन इस फैसले को चंद्रशेखर ने हाईकोर्ट में चुनौती दी और न्याय प्राप्त किया।
सोशल मीडिया पर उसकी निंदनीय स्थिति
चंद्रशेखर ने अदालत में यह दलील दी कि उसे बिना ब्रेक के लगातार दो महीने तक दो शिफ्टों में काम करने के लिए मजबूर किया गया था। भारी कार्यभार और थकान के कारण उसने कुछ समय के लिए सोने का निर्णय लिया था। इसके बाद, सोशल मीडिया पर उसकी निंदनीय स्थिति का वीडियो वायरल हुआ, जिसके चलते केकेआरटीसी ने उसे निलंबित कर दिया। हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए, चंद्रशेखर ने कहा कि उसे सोने का कोई अवसर नहीं दिया जा रहा था और काम के घंटों की अत्यधिक लम्बाई के कारण वह शारीरिक रूप से थक चुका था। वहीं, केकेआरटीसी ने दावा किया कि वीडियो में कांस्टेबल का सोते हुए दिखाई देना निगम की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला था और इससे उसे निलंबित किया गया।
कामकाजी घंटों और थकान का सामना करना पड़ा
हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एम नागप्रसन्ना ने मामले की गहरी सुनवाई के बाद यह फैसला दिया कि कांस्टेबल का निलंबन गलत था और इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने केकेआरटीसी की कार्रवाई को गलत ठहराया और कहा कि संस्था ने खुद ही कांस्टेबल को बिना ब्रेक के अत्यधिक घंटों तक काम करने के लिए मजबूर किया था, जो कि उसकी जिम्मेदारी नहीं थी। अदालत ने कहा कि चंद्रशेखर को काम के दौरान सोने का कोई दोष नहीं था, क्योंकि उसे अत्यधिक कामकाजी घंटों और थकान का सामना करना पड़ा था।
लोगों के सोने और आराम करने के अधिकार का भी जिक्र
न्यायमूर्ति ने इस दौरान संविधान के तहत लोगों के सोने और आराम करने के अधिकार का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सभी कर्मचारियों को काम के दौरान उचित आराम का अधिकार होता है, और इसे नकारना मानवाधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अनुच्छेद 24 में भी आराम और छुट्टी के अधिकार की पुष्टि की गई है।
काम के घंटों पर जज की टिप्पणी
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कांस्टेबल के सामान्य काम के घंटे एक दिन में आठ घंटे होते हैं, लेकिन यहां उसे दो शिफ्टों में 16 घंटे काम करने के लिए कहा गया था। यह कामकाजी नियमों और मानवाधिकारों के विपरीत था। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह न केवल कांस्टेबल के लिए बल्कि सभी कर्मचारियों के लिए एक सही कामकाजी माहौल सुनिश्चित करना जरूरी है।
कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि कांस्टेबल चंद्रशेखर को निलंबन की अवधि के दौरान सभी वेतन और लाभ दिए जाएं। इसके साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर चंद्रशेखर एक शिफ्ट में काम करने के दौरान सोते तो यह एक गलत बात होती, लेकिन उसे दो शिफ्टों में काम करने के कारण थकान का सामना करना पड़ा और यह एक असाधारण स्थिति थी।
कर्मचारियों के लिए सही कामकाजी घंटों और आराम के महत्व
इस मामले में कोर्ट का निर्णय यह दिखाता है कि कर्मचारियों के लिए सही कामकाजी घंटों और आराम के महत्व को मान्यता दी जाती है। जब कर्मचारियों को अत्यधिक काम का बोझ दिया जाता है और आराम का अवसर नहीं मिलता, तो इसके परिणामस्वरूप थकान और गलतियों का होना स्वाभाविक है। कोर्ट ने यह संदेश दिया कि कामकाजी माहौल को कर्मचारी के अधिकारों के अनुरूप बनाना आवश्यक है, और अगर कर्मचारी आराम की जरूरत महसूस करता है, तो उसे यह अधिकार मिलना चाहिए।