भारतीय निवेशकों को बहुत महंगा पड़ रहा ईरान युद्ध, संकट में 10.68 अरब डॉलर का कृषि और डेयरी निर्यात
punjabkesari.in Monday, Mar 30, 2026 - 10:33 AM (IST)
National Desk: खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के व्यापार पर भी दिखने लगा है। खासकर कृषि, डेयरी और छोटे उद्योगों के निर्यात पर इसका सीधा असर पड़ रहा है।
भारत के 10.68 अरब डॉलर के निर्यात पर संकट
अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण भारत से खाड़ी देशों में होने वाला निर्यात प्रभावित हो रहा है। भारत का करीब 10.68 अरब डॉलर का कृषि और डेयरी निर्यात संकट में है। इसके अलावा एमएसएमई (छोटे उद्योग), जैसे हैंडीक्राफ्ट, मसाले और अन्य उत्पादों का निर्यात भी प्रभावित हो रहा है। लॉजिस्टिक्स में दिक्कतों और बढ़ती लागत के कारण कई कंटेनर रास्ते में ही फंस गए हैं। इसका असर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और राजस्थान के निर्यातकों पर ज्यादा पड़ रहा है।
स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने कदम उठाए हैं
मध्य पूर्व के देश—जैसे सऊदी अरब, ओमान, कतर, बहरीन, ईरान, इराक और यमन—भारत के बड़े बाजार हैं। इन देशों में भारत के कुल कृषि निर्यात का लगभग 20.5% हिस्सा जाता है। एक महीने बाद भी हालात सामान्य नहीं होने से चिंता बढ़ रही है। स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने कदम उठाए हैं। युद्ध शुरू होने के बाद एक अंतर-मंत्रालयी समूह बनाया गया और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में एक और समिति गठित की गई है। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो सरकार एमएसएमई और कमजोर वर्गों के लिए राहत पैकेज ला सकती है।
सरकार के राहत कदम
19 मार्च को 497 करोड़ रुपये की विशेष योजना शुरू की गई, ताकि निर्यातकों का जोखिम कम हो सके।
निर्यात की समयसीमा 31 अगस्त 2026 तक बढ़ा दी गई है।
कस्टम प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, जिससे फंसे हुए माल को निकालना या वापस भेजना आसान हो सके।
बंदरगाहों पर 24 घंटे अधिकारी तैनात किए गए हैं और जल्दी खराब होने वाले सामान को प्राथमिकता दी जा रही है।
शिपमेंट रद्द करने, माल वापस लाने और जुर्माना माफ करने जैसी सुविधाएं भी दी गई हैं।
राजस्थान का हाल
राजस्थान के करीब 120 कंटेनर ओमान के बंदरगाह पर फंसे हुए हैं। इससे हैंडीक्राफ्ट और मसालों का निर्यात प्रभावित हुआ है। एक निर्यातक के अनुसार, उनके कंटेनर सऊदी अरब की जगह ओमान में ही रोक दिए गए, जिससे उन्हें काफी नुकसान हो रहा है। एक कंटेनर वापस मंगाने में करीब 3 लाख रुपये तक का खर्च आ सकता है।
निर्यातकों ने सरकार को बताया है कि भाड़ा दरें बढ़ गई हैं, युद्ध जोखिम शुल्क लग रहा है, कंटेनरों की कमी है और शिपमेंट में देरी हो रही है। सरकार इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है।
