दूल्हा एक नहीं अनेक! भारत के इस इलाके में सगे भाई करते हैं एक ही युवती से विवाह, जानें क्यों?

punjabkesari.in Sunday, Feb 15, 2026 - 12:07 PM (IST)

Kinnaur Marriage Tradition : आधुनिकता के इस दौर में जहां शादियों के रीति-रिवाज बदल रहे हैं वहीं भारत के हिमालयी क्षेत्रों में एक ऐसी प्राचीन परंपरा आज भी जीवित है जो हमें सीधे द्वापर युग की याद दिलाती है। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ दुर्गम इलाकों में बहुपति विवाह (Polyandry) की प्रथा आज भी समाज का हिस्सा है जिसमें परिवार के सभी भाई मिलकर एक ही युवती से विवाह रचाते हैं।

हालिया घटना ने सबको चौंकाया

हाल ही में हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के ट्रांस-गिरी क्षेत्र में एक ऐसी ही शादी चर्चा का केंद्र बनी। यहां हट्टी समुदाय के दो सगे भाइयों ने एक ही युवती के साथ सात फेरे लिए। पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ कई दिनों तक चले इस विवाह समारोह में पूरा गांव शरीक हुआ। खास बात यह रही कि यह शादी किसी दबाव में नहीं बल्कि दूल्हों और दुल्हन की आपसी रजामंदी से संपन्न हुई। स्थानीय भाषा में इस अनोखी प्रथा को जोड़ीदार या जजदा कहा जाता है।

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क्यों निभाई जाती है यह परंपरा?

70 और 80 के दशक के बाद ऐसी शादियों में कमी आई थी लेकिन हाल के कुछ उदाहरणों ने फिर से सबका ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार इस प्रथा के पीछे धार्मिक ही नहीं बल्कि मजबूत आर्थिक कारण भी छिपे हैं:

संपत्ति का बंटवारा रोकना: पहाड़ों में कृषि योग्य भूमि बहुत सीमित है। यदि हर भाई अलग शादी करे तो जमीन के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। एक ही पत्नी होने से परिवार संयुक्त रहता है और पैतृक संपत्ति का बंटवारा नहीं होता।

पारिवारिक एकजुटता: यह परंपरा परिवार को बिखरने से बचाती है। घर के सभी मर्द मिलकर खेती और पशुपालन की जिम्मेदारी संभालते हैं।

बच्चों की परवरिश: बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी पूरे परिवार की होती है हालांकि परंपरा के अनुसार सबसे बड़े भाई को ही बच्चों का कानूनी पिता माना जाता है।

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किन इलाकों में है इसका प्रभाव?

यह प्रथा मुख्य रूप से हिमाचल के किन्नौर, सिरमौर और उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में देखने को मिलती है। इन जनजातीय क्षेत्रों में इसे पांडव परंपरा का सम्मान माना जाता है।

कानून और समाज का नजरिया

भारतीय कानून सामान्यतः बहुपति विवाह को मान्यता नहीं देता लेकिन हिमाचल के कुछ राजस्व रिकॉर्ड्स (Revenue Records) में जोड़ीदार प्रथा का जिक्र आज भी मिलता है। समाज में इसे घृणा की नजर से नहीं बल्कि विरासत और एकता को सहेजने के एक तरीके के रूप में देखा जाता है। हालांकि नई पीढ़ी और बढ़ती शिक्षा के कारण अब ऐसी शादियाँ बहुत दुर्लभ हो गई हैं।


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Content Editor

Rohini Oberoi

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