इंसानी कचरे से बनेंगी सुपर-स्ट्रांग बिल्डिंग: रिसर्च में दावा- मल से बना ''बायोचार'' बढ़ाएगा इमारतों की उम्र
punjabkesari.in Thursday, Sep 10, 2026 - 10:02 AM (IST)
नई दिल्ली: वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है जो आने वाले समय में निर्माण उद्योग (Construction Industry) का चेहरा बदल सकती है। 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' जर्नल में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के अनुसार, सेप्टिक टैंकों और सैनिटेशन सिस्टम से मिलने वाले इंसानी कचरे को प्रोसेस करके 'बायोचार' बनाया गया है। इस बायोचार का इस्तेमाल कंक्रीट में सीमेंट की जगह आंशिक रूप से (Partial Replacement) किया जा सकता है, जिससे इमारतें न केवल अधिक मजबूत बनेंगी, बल्कि पर्यावरण को भी बड़ा फायदा पहुंचेगा।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि ट्रीट किए गए मल के कचरे से बना मटीरियल कंक्रीट में सीमेंट की जगह कुछ हद तक इस्तेमाल किया जा सकता है और सही मात्रा में मिलाने पर यह कंक्रीट की मज़बूती को काफ़ी बढ़ा सकता है। 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' में छपी इस रिसर्च में मल के कचरे (सेप्टिक टैंक और सैनिटेशन सिस्टम से इकट्ठा किया गया ट्रीट किया हुआ इंसानी कचरा) से बने बायोचार का कंक्रीट में सीमेंट के आंशिक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावनाओं को परखा गया। खास ट्रीटमेंट प्लांट मल के कचरे को इकट्ठा करते हैं और उसे प्रोसेस करते हैं।
रिसर्चर ने इस मटीरियल को बायोचार (कार्बन से भरपूर पदार्थ) में बदला और इसे कंक्रीट में मिलाकर देखा कि क्या इससे कंस्ट्रक्शन मटीरियल ज़्यादा मज़बूत और टिकाऊ बन सकता है। नतीजे चौंकाने वाले थे। जिस कंक्रीट में सीमेंट की जगह 10% बायोचार (मल के कचरे से बना) मिलाया गया था, उसमें 91 दिनों की क्योरिंग (पकने की प्रक्रिया) के बाद कंप्रेसिव स्ट्रेंथ में 21% और फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ में 42% की बढ़ोतरी देखी गई।
कंप्रेसिव स्ट्रेंथ यह बताती है कि कंक्रीट कितना दबाव झेल सकता है, जबकि फ्लेक्सुरल स्ट्रेंथ यह बताती है कि वह मुड़ने और टूटने (क्रैकिंग) का कितना अच्छा मुकाबला कर सकता है। रिसर्चर ने बायोचार की अलग-अलग मात्राओं का टेस्ट किया और कई गुणों की जांच की, जिनमें मज़बूती, पानी सोखने की क्षमता, पोरॉसिटी (छिद्रों की मात्रा) और सूखने पर सिकुड़न (drying shrinkage) शामिल हैं।
नतीजों से पता चला कि सीमेंट की जगह 5% से 10% तक बायोचार का इस्तेमाल करने से कंक्रीट की परफॉर्मेंस बेहतर हो सकती है। 15% बायोचार मिलाने पर, 28 दिनों के बाद पानी सोखने की क्षमता और पोरॉसिटी पारंपरिक कंक्रीट के बराबर ही पाई गई। यह मटीरियल समय के साथ स्थिर भी रहा। 120 दिनों के बाद, 10% बायोचार वाले मोर्टार में सूखने पर सिकुड़न साधारण पोर्टलैंड सीमेंट मोर्टार जैसी ही देखी गई, जिससे पता चलता है कि यह मटीरियल लंबे समय तक अपना आकार और स्थिरता बनाए रख सकता है। स्टडी में यह भी पाया गया कि जैसे-जैसे बायोचार की मात्रा बढ़ाई गई, कंक्रीट के नमूनों में भारी धातुओं की मात्रा कम होती गई, जिससे पर्यावरण में हानिकारक पदार्थों के रिसने (leaching) की संभावना कम हो सकती है।
इस रिसर्च से पर्यावरण को दोहरा फ़ायदा हो सकता है: ट्रीट किए गए इंसानी कचरे का उपयोगी इस्तेमाल और कंक्रीट में सीमेंट की ज़रूरत में कमी। सीमेंट बनाने में बहुत ज़्यादा ऊर्जा लगती है और यह दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा कारण है। हालांकि, निर्माण कार्य में मल-कीचड़ से बने बायोचार का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले और रिसर्च और असल दुनिया में टेस्टिंग की ज़रूरत होगी। लेकिन यह स्टडी बताती है कि भविष्य की इमारतें कुछ हद तक उस चीज़ से बन सकती हैं जिसे हम आज फ्लश करके बहा देते हैं।
