Cancer Awareness: कैंसर का डर होगा खत्म! ट्यूमर बनने से पहले ही पता लगेगी दिक्कत? जानें क्या कहती है मेडिकल साइंस

punjabkesari.in Thursday, Mar 05, 2026 - 12:11 PM (IST)

नेशनल डेस्क: दुनिया भर में कैंसर के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इस बीमारी के शुरुआती लक्षण अक्सर स्पष्ट नहीं होते। कई बार जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक ट्यूमर काफी बढ़ चुका होता है। ऐसे में वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे भविष्य में एक साधारण ब्लड टेस्ट के जरिए बहुत शुरुआती स्तर पर ही कैंसर का संकेत मिल सकता है।

नई रिसर्च के अनुसार वैज्ञानिकों ने एक बेहद संवेदनशील लाइट-आधारित सेंसर तैयार किया है, जो खून में मौजूद कैंसर से जुड़े बायोमार्कर की बहुत छोटी मात्रा को भी पहचान सकता है। यह तकनीक इतनी सटीक बताई जा रही है कि इसमें जांच के लिए सिर्फ कुछ ही मॉलिक्यूल की मौजूदगी पर्याप्त हो सकती है।

शोध में क्या सामने आया
वैज्ञानिक जर्नल Optica में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, चीन की शेनजेन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को विकसित किया है। प्रोफेसर हान झांग के नेतृत्व में बनी रिसर्च टीम ने कई आधुनिक तकनीकों को एक साथ जोड़कर यह सिस्टम तैयार किया।

इसमें डीएनए नैनोस्ट्रक्चर, क्वांटम डॉट्स, क्रिस्पर जीन एडिटिंग तकनीक और एक विशेष ऑप्टिकल प्रक्रिया सेकंड हार्मोनिक जेनरेशन (SHG) का इस्तेमाल किया गया है। इन सभी तकनीकों के संयोजन से बना यह सेंसर खून में मौजूद कैंसर से जुड़े माइक्रोआरएनए को बेहद सटीक तरीके से पहचान सकता है।

अभी कैसे होती है कैंसर की जांच
वर्तमान समय में कैंसर की शुरुआती जांच के लिए ज्यादातर दो तरीके अपनाए जाते हैं। पहला तरीका इमेजिंग तकनीक है, जैसे कि सीटी स्कैन या एमआरआई। इनसे ट्यूमर तब दिखाई देता है जब वह एक निश्चित आकार तक पहुंच चुका होता है। दूसरा तरीका पीसीआर (PCR) आधारित जांच है, जिसमें जेनेटिक सामग्री को कई गुना बढ़ाकर मापा जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में समय लगता है और कई चरणों से गुजरना पड़ता है।

नई तकनीक इन दोनों से अलग है। इसमें किसी तरह की केमिकल एम्प्लीफिकेशन की जरूरत नहीं होती। जैसे ही खून में कैंसर से जुड़ा बायोमार्कर मौजूद होता है, सेंसर के लाइट सिग्नल में बदलाव आ जाता है और उसी के आधार पर पहचान की जा सकती है।

माइक्रोआरएनए की भूमिका
यह नया सेंसर खास तौर पर माइक्रोआरएनए नाम के छोटे आरएनए अणुओं को पहचानने के लिए डिजाइन किया गया है। ये अणु शरीर में जीन की गतिविधियों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ खास माइक्रोआरएनए, जैसे miR-21, miR-155 और miR-10b, फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती चरण से जुड़े पाए गए हैं। समस्या यह है कि शुरुआती अवस्था में इनकी मात्रा बेहद कम होती है, इसलिए इन्हें पहचानना मुश्किल होता है।

नई तकनीक की खासियत यह है कि यह बेहद कम स्तर पर मौजूद इन अणुओं को भी पकड़ सकती है। प्रयोगशाला परीक्षणों में यह डिवाइस miR-21 को 168 ज़ेप्टोमोलर जैसी बहुत कम मात्रा में भी पहचानने में सक्षम रही। इसका मतलब है कि खून के नमूने में मौजूद केवल कुछ दर्जन मॉलिक्यूल भी इस सेंसर द्वारा पकड़े जा सकते हैं।

विशेष सामग्री का इस्तेमाल
इस सेंसर को बनाने में मोलिब्डेनम डिसल्फाइड की बहुत पतली परत का इस्तेमाल किया गया है। यह पदार्थ विशेष रूप से मजबूत ऑप्टिकल सिग्नल उत्पन्न करने के लिए जाना जाता है, जिससे सूक्ष्म स्तर पर बदलाव को भी पहचानना संभव हो जाता है।


भविष्य में क्या हो सकता है फायदा
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर माइक्रोआरएनए जैसे संकेतों को ट्यूमर बनने से पहले ही पहचान लिया जाए तो कैंसर की जांच और इलाज की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। आने वाले समय में यह तकनीक सिर्फ कैंसर ही नहीं, बल्कि वायरल संक्रमण, बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों और यहां तक कि अल्जाइमर जैसे न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों की शुरुआती पहचान में भी मददगार साबित हो सकती है।

 


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Content Editor

Mansa Devi

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