sperm live after death: मौत के बाद स्पर्म कितने घंटे तक जीवित रहता है और क्या बन सकती है मां?
punjabkesari.in Tuesday, Mar 24, 2026 - 02:47 PM (IST)
इंसानी जिंदगी के खत्म होने के बाद क्या कुछ शेष रह जाता है? यादें और विरासत तो सभी छोड़ जाते हैं, लेकिन विज्ञान ने अब एक ऐसी खिड़की खोल दी है जहां एक व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद भी नई जिंदगी को जन्म दे सकता है। यह सुनने में किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लग सकता है, लेकिन मेडिकल साइंस में इसे 'पोस्टह्यूमस स्पर्म रिट्रीवल' (Posthumous Sperm Retrieval) के नाम से जाना जाता है। सरल शब्दों में कहें तो, किसी पुरुष की मौत के बाद उसके शरीर से शुक्राणु (स्पर्म) निकालकर उन्हें सुरक्षित रखना और भविष्य में उनसे गर्भधारण करना अब हकीकत है।
वक्त की सुई और स्पर्म की सांसें
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा खिलाड़ी 'समय' है। मौत के बाद शरीर की कोशिकाएं धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं, लेकिन शुक्राणु शरीर के बाकी हिस्सों की तुलना में थोड़ी ज्यादा देर तक संघर्ष कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौत के 24 घंटों के भीतर स्पर्म निकाल लिए जाएं, तो उनके सक्रिय रहने की संभावना सबसे अधिक होती है। कुछ दुर्लभ मामलों में यह समय सीमा 36 घंटे तक भी जा सकती है, लेकिन जैसे-जैसे मिनट बीतते हैं, शुक्राणुओं की गुणवत्ता और उनकी जीवन शक्ति कम होती जाती है। यही वजह है कि अस्पताल और लैब में इस काम को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
कानून और नैतिकता की पेचीदा राह
तकनीक तो मौजूद है, लेकिन असली चुनौती मेडिकल से ज्यादा कानूनी और सामाजिक है। मान लीजिए कि किसी व्यक्ति ने अपनी वसीयत में या जीवनसाथी से इस बारे में चर्चा नहीं की है, तो क्या उसकी मृत्यु के बाद उसके शरीर पर किसी और का हक रह जाता है? ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी इसके लिए कानून पूरी तरह साफ नहीं हैं। कई बार परिवार को अदालत के चक्कर काटने पड़ते हैं और जब तक इजाजत मिलती है, तब तक मेडिकल तौर पर बहुत देर हो चुकी होती है। इसीलिए हेल्थ एक्सपर्ट्स अब यह सुझाव देने लगे हैं कि जिस तरह लोग 'अंगदान' (Organ Donation) पर चर्चा करते हैं, उसी तरह कपल्स को इस विषय पर भी खुलकर बात करनी चाहिए।
एक अधूरा अहसास और बड़ा सवाल
विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग इस तकनीक को उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण मानता है जो अपने दिवंगत साथी की आखिरी निशानी के रूप में संतान चाहती हैं। हालांकि, इसके साथ एक नैतिक सवाल भी जुड़ा है-क्या उस बच्चे के हक में यह फैसला सही है जो कभी अपने पिता को देख ही नहीं पाएगा? अंततः, यह विज्ञान, भावनाओं और कानून का एक ऐसा संगम है जहां हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है। मरणोपरांत पिता बनना भले ही आज संभव हो, लेकिन इसके लिए स्पष्ट सहमति और समय रहते लिए गए फैसले सबसे ज्यादा जरूरी हैं।
