अनोखा फैसला: 'ब्रेन डेड' पति भी बन सकेगा पिता, केरल हाई कोर्ट ने महिला को दी स्पर्म सुरक्षित रखने की इजाजत

punjabkesari.in Thursday, Mar 19, 2026 - 08:10 PM (IST)

कोच्चि: न्याय और जज्बात के संगम का एक दुर्लभ उदाहरण पेश करते हुए केरल हाई कोर्ट ने एक महिला को उसके 'ब्रेन डेड' पति के शुक्राणु (स्पर्म) सुरक्षित रखने की अंतरिम मंजूरी दे दी है। यह मामला उस वक्त सामने आया जब एक महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर अपने पति के अंश को सहेजने की गुहार लगाई, जो वर्तमान में वेंटिलेटर सपोर्ट पर जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहे हैं। कोर्ट ने कोझिकोड के संबंधित अस्पताल को निर्देश दिया है कि वह एक मान्यता प्राप्त 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी' (ART) क्लिनिक के माध्यम से प्रजनन कोशिकाओं को सुरक्षित करने की प्रक्रिया को तुरंत पूरा करे।

बीमारी ने छीनी उम्मीद, कानून ने बढ़ाया हाथ
याचिकाकर्ता महिला के जीवन में यह संकट तब आया जब उसके पति चिकन पॉक्स की चपेट में आ गए। इसके करीब दो सप्ताह बाद स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें 'एक्सटेंसिव सेरेब्रल वीनस थ्रोम्बोसिस' (मस्तिष्क की नसों में खून का थक्का जमना) हो गया। डॉक्टरों ने उन्हें 'ब्रेन डेड' घोषित कर दिया, जिसके बाद से वे मशीनों के सहारे हैं। महिला की सबसे बड़ी कानूनी चुनौती यह थी कि ART एक्ट की धारा 22 के तहत किसी भी प्रजनन प्रक्रिया के लिए पति की लिखित सहमति अनिवार्य है, लेकिन वर्तमान स्थिति में उनके पति हस्ताक्षर करने या सहमति देने में असमर्थ हैं। महिला ने भावुक दलील दी कि यदि इस समय देरी हुई, तो उनके मां बनने और उनके पति के वंश को आगे बढ़ाने का सपना हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

अदालत की सख्त शर्तें और भविष्य की राह
मामले की संवेदनशीलता और मानवीय पक्ष को देखते हुए न्यायमूर्ति ने अंतरिम राहत तो दे दी है, लेकिन इसके साथ कुछ कड़ी शर्तें भी जोड़ी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल अनुमति केवल गैमीट्स (प्रजनन कोशिकाओं) को निकालने और उन्हें सुरक्षित फ्रीज करने तक ही सीमित है। इसके बाद की कोई भी प्रक्रिया, जैसे कि IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन), बिना कोर्ट की अग्रिम अनुमति के शुरू नहीं की जा सकेगी। कानूनी बारीकियों और इस पेचीदा स्थिति की विस्तृत जांच के लिए अदालत ने अगली सुनवाई 7 अप्रैल 2026 को तय की है।

क्यों मील का पत्थर साबित होगा यह आदेश?
भारतीय कानून और चिकित्सा जगत के लिए यह फैसला एक बड़ी नजीर बन सकता है। आमतौर पर भारत में प्रजनन से जुड़ी किसी भी तकनीक के इस्तेमाल के लिए दंपति की आपसी और लिखित रजामंदी को अनिवार्य माना जाता है। लेकिन जहां जीवनसाथी सहमति देने की स्थिति में ही न हो, वहां कानून की कठोरता किसी के माता-पिता बनने के अधिकार को बाधित कर सकती है। केरल हाई कोर्ट का यह कदम भविष्य में ऐसे ही अन्य जटिल मामलों के लिए मार्गदर्शन का काम करेगा, जहां विज्ञान और कानून को मानवीय संवेदनाओं के साथ तालमेल बिठाना पड़ता है।


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Content Editor

Anu Malhotra

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