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लेबर डे पर सबसे ज्यादा बेबस लेबर, दिहाड़ी तो दूर खाने के पड़े लाले

2020-05-02T17:58:39.897

जम्मू (सतीश) : पूरा विश्व कोरोना महामारी की भयंकर चपेट में है और इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव दिहाड़ीदारों पर पड़ा है। दिहाड़ी वालों की रोजी रोटी तक इस कोरोना ने छीन ली है। वहीं आज विश्व भर में लेबर डे मनाया जा रहा है लेकिन आज लेबर डे पर सबसे ज्यादा बेबस भी मजदूर वर्ग ही है क्योंकि उनकी दिहाड़ी तो दूर की बात है, उन्हें खाने के लाले पड़े हुए हैं। जम्मू कश्मीर के मजदूर बाहरी राज्यों व बाहरी राज्यों के मजदूर जम्मू कश्मीर में फंसे हुए हैं और पूरा मजदूर वर्ग प्रशासन व एन.जी.ओ. द्वारा वितरित किए जा रहे राशन पर निर्भर हो गया है। 

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विश्व भर में मजदूर दिवस मनाने की प्रथा 1 मई 1886 से आरंभ हुई थी जब अमेरिका की मजदूर यूनियनों नें काम का समय 8 घंटे से ज्यादा न रखे जाने के लिए हड़ताल की थी। धीरे-धीरे यह दिवस विश्व के कई देशों में फैल गया। भारत में भी 1 मई को लेबर डे मनाया जाने लगा। मौजूदा समय भारत और अन्य देशों में मजदूरों के 8 घंटे काम करने से संबंधित कानून लागू है लेकिन आज कोरोना वैश्विक महामारी ने मजदूरों के आर्थिक हालात बुरी तरह बिगाड़ दिए हैं। वहीं आज मजदूरों के हितों लेकर न तो कोई कार्यक्रम आयोजित होंगे और न मजदूर कोई सैलीब्रेशन कर पाएंगे क्योंकि लाकडाउन के चलते अधिकतर फैक्ट्रियों में ताले लगे हुए हैं। ठेके पर काम करने वाले मजदूरों के घर के चूल्हे तक नहीं जल पा रहे हैं। वहीं सरकार ने इन मजदूरों को राहत पैकेज देने की घोषणा की है लेकिन अनियमित श्रमिकों को फिलवक्त कोई पूछने वाला नहीं है। देश में कोरोना के चलते अचानक लगा लॉकडाउन प्रवासी मजदूरों पर सबसे ज्यादा भारी पड़ा है। 

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लाकडाउन के कारण फंसे हैं कई मजदूर
कृष्ण लाल, बनारसी व तिलक राज ने कहा कि वे जम्मू कश्मीर में फंसे हुए हैं क्योंकि लाकडाउन के चलते अपने घरों में नहीं जा सकते हैं और यहां कोई काम भी नहीं है और ऐसे में जिनसे हम किराना लेते थे उन्होंने भी उधार पर सामान देने से इंकार कर दिया है। खाने के लाले पड़ गए हैं, पेट में भूख की आग जल रही है। भूख मिटाने के लिए कोई भी रास्ता अभी तक दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि यह कोरोना बीमारी के चलते आगे कितना लाकडाउन रहेगा इसके बारे में अभी कुछ नहीं कह सकते हैं। काम धंधा सब बंद है और केवल एन.जी.ओ. के राशन के पैकेट के सहारे दिन काटने को मजबूर हैं। ऐसे ही अन्य मजदूरों ने कहा कि मार्च के शुरूआत तक सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन कोरोना बीमारी ने उनकी मुसीबतें मार्च में ही बढ़ानी आरंभ कर दी थी जो अभी तक खत्म नहीं हो रही हैं। मॉल और दुकानें व बाजार मजदूरों से गुलजार रहते थे। इसके अलावा नरवाल स्थित फू्रट व सब्जी मण्डी, वेयर हाउस व निर्माण का बहुत काम था जो अब सब बंद है। वहीं दुकानों पर काम करने वाले मजदूर, माल वाहनों से सामान ढुलाई करने वाले मजदूर सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। रेलवे स्टेशन में कुली का काम करने वाले भी बेरोजगार है। जम्मू में वर्ष भर चलने वाली श्री माता वैष्णो देवी यात्रा के बंद होने के कारण कई दिहाड़ीदार बेरोजगार हो गए हैं। इस धार्मिक स्थल के कारण हजारों लाखों मजदूरों को रोजगार मिलता था। इसी प्रकार पर्यटन से जुड़े दिहाड़ीदार भी रोजगार से वंचित हैँ क्योंकि पर्यटन सीजन के दौरान लाकडाउन है। 

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बिन काम कैसे मनाएं मजदूर दिवस
मार्बल वर्कर यूनियन के महासचिव मुकेश कुमार यादव ने कहा कि लाकडाउन के कारण कोई काम नहीं है और न ही खाने के लिए कोई व्यवस्था है ऐसे में मजदूर दिवस भी कैसे मनाएं। पूरी मार्बल मार्किट बंद होने के कारण अभी सबसे पहले अपने और परिवार का पेट पालने की चिंता रहती है। यहां मजदूरों को राशन व अन्य सामान देने भी कोई नहीं आया है। सैंकड़ों की संख्या में बाहरी राज्यों के मजदूर जम्मू में फंसे हुए है और इन सभी मजदूरों की सूची श्रम विभाग को 10-12 दिन पहले दे दी गई थी और निवेदन किया गया  था कि हमें राशन की सहायता की जाए। लेकिन 10 दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक कोई सहायता नही दी गई है। अभी भूखे मरने की नौबत आ रही है। छोटे छोटे बच्चे भुखमरी का शिकार होते जा रहे है। जीने के लिए तीन नहीं तो कम से कम दो वक्त का खाना तो चाहिये। वहीं मार्च के बाद से फैक्ट्रियां बंद हैं और मजदूरों को 1 मई की छुट्टी की भी कोई खुशी नहीं है क्योंकि गत लगभग 1 महीने से सभी छुट्टी पर ही हैं। वहीं प्रवासी मजदूरों को जब तक लाकडाउन का पता चला तब तक टे्रन-बस सब बंद हो चुकी है और उनके पास राशन भी एक-दो दिन का ही थी। अब जिन ठिकानों पर रहते हैं उसका किराया भरना भी मुश्किल हो रहा है।  

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बाहरी राज्यों में फंसे जम्मू कश्मीर के लोगों, मजदूरों व छात्रों को वापस लाने की व्यवस्था की जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए मापदंडों के अनुरूप ही उनके आवागमन हेतु तैयारी की जा रही है। जो लोग दूर के राज्यों में फंसे हैं उनको राज्य में वापस लाया जा रहा है। राज्य सरकारें आपस में समन्वय कर रही हैं। वहीं जम्मू कश्मीर में बाहरी राज्यों के फंसे मजदूरों को भी उनके गंतव्य स्थान पर भेजा रहा है लेकिन आज मई दिवस पर उनके चेहरों पर मायूसी साफ छलक रही है। शायद ही कभी इतनी मायूसी और बेबसी मई दिवस पर कभी देखी होगी। 


Monika Jamwal

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