gold import bill: सरकार का बड़ा प्लान- घरों में पड़ा 1,000 टन सोना बाजार में लाने की तैयारी, जौहरी भी बनेंगे कलेक्शन पार्टनर

punjabkesari.in Saturday, Jul 04, 2026 - 12:11 PM (IST)

मुंबई: केंद्र सरकार एक बार फिर Gold Monetisation Scheme (GMS) को नए तरीके से लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इस योजना का मकसद है देश के घरों और लॉकरों में पड़े इस्तेमाल न किए जाने वाले सोने को बाजार में लाना, ताकि भारत का भारी gold import bill कम किया जा सके और अर्थव्यवस्था को फायदा मिले।

घरों में कितना सोना?
अनुमान के मुताबिक, भारतीय परिवारों के पास करीब 25,000 टन सोना रखा हुआ है, जो दुनिया के सबसे बड़े निजी गोल्ड स्टॉक्स में से एक है। सरकार का लक्ष्य है कि इसमें से करीब 1,000 टन सोना धीरे-धीरे बाजार में लाया जाए। अगर इसका सिर्फ 5% हिस्सा भी सिस्टम में आ जाता है, तो करीब ₹8.5 लाख करोड़ तक की नकदी अर्थव्यवस्था में जुड़ सकती है और उतनी ही मात्रा में सोने का आयात कम हो सकता है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस नई स्कीम में सिर्फ बैंक ही नहीं बल्कि पूरे देश के जौहरियों को भी collection partners के रूप में शामिल किया जा सकता है, ताकि आम लोगों को अपना सोना जमा कराने में आसानी हो और प्रक्रिया ज्यादा सरल और भरोसेमंद बन सके। सरकार का मानना है कि जब सोना सुरक्षित तरीके से सिस्टम में आएगा तो इसका बेहतर आर्थिक उपयोग संभव होगा।

बुलियन मार्केट के अनुमान के मुताबिक, अगर भारतीय परिवारों के पास मौजूद कुल सोने का सिर्फ 5% हिस्सा भी इस योजना के तहत बाजार में आ जाता है, तो इससे करीब ₹8.5 लाख करोड़ तक की नकदी अर्थव्यवस्था में आ सकती है। इतनी बड़ी राशि के सिस्टम में आने से देश का सोने का आयात भी काफी हद तक कम हो सकता है और आयात बिल में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। यह पहल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील से भी जोड़ा जा रहा है, जिसमें उन्होंने लोगों से एक साल तक सोना न खरीदने की सलाह दी थी। 

आयात और डॉलर पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह योजना सफल रही, तो भारत में सोने का आयात करीब 2 साल तक लगभग शून्य तक पहुंच सकता है। इससे:
-डॉलर की मांग कम होगी
-रुपया मजबूत हो सकता है
-देश का चालू खाता घाटा (CAD) घट सकता है।

2015 में क्यों फेल हुई पहले की योजना?
2015 में शुरू हुई Gold Monetisation Scheme का प्रदर्शन कमजोर रहा। करीब 10 साल में सिर्फ 38 टन सोना ही सिस्टम में आ पाया, जबकि क्षमता हजारों टन की थी। इस योजना के तहत लोगों को यह सुविधा दी गई थी कि वे अपना सोना बैंकों में जमा कर सकते हैं और इसके बदले उन्हें करीब 2.25% से 2.5% तक ब्याज दिया जाता था। जमा किया गया सोना सुरक्षित बैंक लॉकर में रखा जाता था और उस पर रिटर्न मिलता था।

इसके पीछे कारण थे....लोगों का पुश्तैनी गहनों से भावनात्मक लगाव है जिसे वह बेचना नहीं चाहते। इसके साथ  ही लोगों में टैक्स और जांच का डर है। ब्याज दर और सोने की कीमतों को लेकर अनिश्चितता भी एक बड़ा कारण है।


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Content Editor

Anu Malhotra

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