छत के पंखे हटाने पर बहस के बीच विदेशी विश्वविद्यालयों ने खुदकुशी रोकने के लिए किए ये बदलाव

punjabkesari.in Sunday, Oct 04, 2026 - 12:55 PM (IST)

नई दिल्ली : विद्यार्थियों की आत्महत्या रोकने की कोशिशों के बीच भारतीय शिक्षण संस्थान अपने यहां पंखों में भी बदलाव कर रहे हैं। कहीं स्प्रिंग लगे 'आत्महत्या रोधी' पंखे लगाए जा रहे हैं, तो कहीं पंखों को जाली से ढका जा रहा है और कुछ संस्थान छत की जगह दीवार वाले पंखे लगा रहे हैं। इन कदमों को भले ही 'तात्कालिक उपाय' कहकर आलोचना का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन कई विदेशी विश्वविद्यालय भी पहले ऐसे भौतिक बदलाव अपना चुके हैं। 

अमेरिका के ह्यूस्टन विश्वविद्यालय (यूएच) ने परिसर में आत्महत्या की दो घटनाओं के बाद 2023 में अपने बुनियादी ढांचे में कई बदलाव किए थे जिसके तहत इमारत के चारों ओर सुरक्षा बाड़ लगाने के साथ-साथ ऊपरी मंजिल के छज्जों, अंदरूनी सीढ़ियों और इमारतों को जोड़ने वाले खुले गलियारों को अस्थायी अवरोध लगाकर सुरक्षित किया गया था। घटना के बाद विश्वविद्यालय ने 'एग्नेस अर्नोल्ड हॉल टास्कफोर्स' का गठन किया और तीन चरणों में इमारत के नवीनीकरण का काम शुरू किया। 

अमेरिका के कॉर्नेल विश्वविद्यालय में भी 2009-10 के शैक्षणिक सत्र के दौरान आत्महत्या की सिलसिलेवार घटनाओं ने परिसर की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव जरूरी कर दिया था। एक महीने के भीतर विश्वविद्यालय के तीन छात्रों ने 'ईस्ट हिल' के पुलों से या उनके आसपास से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद परिसर के आसपास की गहरी खाइयों पर बने पुलों पर स्टील की सुरक्षा जालियां लगाई गईं। बाद में विश्वविद्यालय ने आठ पुलों पर स्थायी अवरोध लगाए और कुछ खड़ी चट्टानों के किनारों पर भी बाड़ लगा दी। 

हार्वर्ड विश्वविद्यालय के 'मीन्स मैटर' दिशानिर्देशों में भी आत्महत्या रोकने के उपायों के तहत घातक साधनों तक पहुंच सीमित करने की सिफारिश की गई है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) और ब्रुनेल यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में भी छात्रावासों की खिड़कियों पर ऐसे अवरोधक लगाने की नीति है, जिनसे खिड़कियों को एक निश्चित सीमा से अधिक खोला नहीं जा सकता। ऑक्सफोर्ड के वेडहम कॉलेज में छात्रों को खिड़कियों पर लगे इन अवरोधकों के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा, छतों, मुंडेरों और छज्जों तक पहुंच प्रतिबंधित है। बालकनी पर सुरक्षा रेलिंग भी लगाई गई हैं। 

मुंबई स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) के एक छात्र द्वारा 18 सितंबर को परिसर में स्थित छात्रावास के कमरे में फंदा लगाकर आत्महत्या किए जाने की घटना के बाद विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। इस घटना ने एक बार फिर छात्र आत्महत्याओं के मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चिंता संबंधी विकारों की विशेषज्ञ मनोचिकित्सक वैशाली षणमुगम नेकहा कि घातक साधनों तक पहुंच सीमित करना विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिशों का भी हिस्सा है, लेकिन इसे छात्रों को सार्थक सहयोग देने के विकल्प के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। 

उन्होंने कहा, 'परिसर के भौतिक वातावरण में बदलाव पर जरूरत से ज्यादा जोर देने का खतरा यह है कि इससे मानसिक स्वास्थ्य के बड़े संकट से ध्यान हट सकता है। पंखे हटाने से अल्पावधि में कुछ जानें बच सकती हैं। लेकिन अगर हम वास्तव में छात्रों का साथ देना चाहते हैं तो हमें ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी, जहां उन्हें लगे कि उनकी बात सुनी और समझी जा रही है और उनकी परवाह की जा रही है। अब समय आ गया है कि हम गंभीर समस्या पर महज तात्कालिक उपाय करना बंद करें।' 


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Content Writer

Sanjeev

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